लखनऊ (Uttar Pradesh News): स्मार्टफोन, रील्स और सोशल मीडिया के इस दौर में जहां बच्चे किताबों से दूर और स्क्रीन के करीब होते जा रहे हैं, उत्तर प्रदेश सरकार ने एक क्रांतिकारी और सराहनीय फैसला लिया है। अब यूपी के सरकारी और सहायता प्राप्त माध्यमिक एवं बेसिक स्कूलों में दिन की शुरुआत सिर्फ प्रार्थना से नहीं, बल्कि 'अखबार पढ़ने' (Newspaper Reading) से होगी।READ ALSO:-मेरठ कपसाड़ कांड: मां की नृशंस हत्या कर दलित बेटी को उठा ले गए दरिंदे, 24 घंटे बाद भी सुराग नहीं; परिवार ने अंतिम संस्कार रोका, गांव बना छावनी
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कोरोना काल के बाद बच्चों में बढ़ी मोबाइल की लत (Screen Addiction) और कमजोर होती पढ़ने की आदत को सुधारने के लिए शिक्षा विभाग ने 'राजस्थान मॉडल' की तर्ज पर यह बड़ा कदम उठाया है। अपर मुख्य सचिव (माध्यमिक/बेसिक शिक्षा) पार्थ सारथी सेन शर्मा ने 23 दिसंबर 2025 को इस संबंध में एक विस्तृत शासनादेश जारी कर दिया है। 15 जनवरी के बाद, जब सर्दियों की छुट्टियों के बाद स्कूल खुलेंगे, तो यह नजारा बदला हुआ दिखेगा।
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इस विस्तृत रिपोर्ट में हम जानेंगे कि आखिर सरकार को यह फैसला क्यों लेना पड़ा, इसके तहत स्कूलों में कौन-कौन सी गतिविधियां कराई जाएंगी और इस पर अभिभावकों व शिक्षाविदों की क्या राय है।
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1. आदेश का उद्देश्य: स्क्रीन टाइम घटाना और 'रीडिंग कल्चर' लाना
\r\n\r\nअपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि विद्यालयों में 'रीडिंग कल्चर' (Reading Culture) को पुनर्जीवित करना समय की मांग है। वर्तमान परिदृश्य में बच्चे मोबाइल पर गेम खेलने या वीडियो देखने में घंटों बिता रहे हैं, जिससे उनकी भाषाई पकड़ कमजोर हो रही है और सामान्य ज्ञान (General Knowledge) रसातल में जा रहा है।
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आदेश के मुख्य बिंदु:
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- \r\n 10 मिनट का समय: अब हर स्कूल में मॉर्निंग असेंबली (Morning Assembly) के दौरान 10 मिनट का समय विशेष रूप से समाचार पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित किया जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n पुस्तकालय की भूमिका: स्कूलों के पुस्तकालयों में हिंदी और अंग्रेजी के स्तरीय समाचार पत्रों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी, ताकि बच्चों को कंटेंट की कमी न हो।\r\n \r\n
- \r\n रोटेशन सिस्टम: हर दिन अलग-अलग छात्र रोटेशन के आधार पर मंच पर आएंगे और खबरें पढ़ेंगे। इससे न सिर्फ पढ़ने की आदत पड़ेगी, बल्कि बच्चों का मंच का डर (Stage Fear) भी खत्म होगा।\r\n \r\n
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2. क्या पढ़ेंगे बच्चे? सिर्फ खबरें नहीं, सुविचार भी
\r\n\r\nसरकार ने सिर्फ अखबार पढ़ने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि इसका एक पूरा 'ब्लूप्रिंट' तैयार किया है। ऐसा नहीं होगा कि कोई भी खबर पढ़ दी जाए। इसके लिए कड़े निर्देश तय किए गए हैं:
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सकारात्मक खबरों पर जोर: छात्रों को निर्देशित किया जाएगा कि वे संपादकीय लेख (Editorial) के मुख्य अंश, राष्ट्रीय (National), अंतरराष्ट्रीय (International) और खेल जगत (Sports) की प्रमुख सकारात्मक खबरें पढ़कर सुनाएं। अपराध और नकारात्मक खबरों से बच्चों को दूर रखने की सलाह दी गई है।
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'आज का शब्द' और वोकैबुलरी बिल्डिंग: यह इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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- \r\n 5 कठिन शब्द: हर रोज समाचार पत्र से 5 नए और कठिन शब्दों का चयन किया जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n ब्लैकबोर्ड पर प्रदर्शन: इन शब्दों को और उनके अर्थ (Meaning) को प्रार्थना सभा में सभी को बताया जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n डिस्प्ले बोर्ड: स्कूल के मुख्य डिस्प्ले बोर्ड पर 'आज का सुविचार' (Thought of the Day) के साथ-साथ इन 5 शब्दों को अनिवार्य रूप से लिखा जाएगा। इससे आते-जाते बच्चों की नजर उन पर पड़ेगी और उनका शब्दकोश (Dictionary) मजबूत होगा।\r\n \r\n
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3. एक्टिविटी बेस्ड लर्निंग: सुडोकू से लेकर अपनी 'मैगजीन' तक
\r\n\r\nशिक्षा विभाग ने इस पहल को उबाऊ होने से बचाने के लिए इसे मनोरंजक गतिविधियों से जोड़ दिया है। कक्षा के स्तर के अनुसार अलग-अलग कार्य सौंपे गए हैं:
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कक्षा 9 से 12 के लिए (सीनियर छात्र):
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- \r\n संपादकीय चर्चा: सीनियर छात्रों को सप्ताह में एक बार किसी ज्वलंत या महत्वपूर्ण संपादकीय विषय पर अपने 'मौलिक विचार' (Original Thoughts) लिखने के लिए कहा जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n ग्रुप डिस्कशन: क्लासरूम में स्थानीय समस्याओं (जैसे- जल जमाव, प्रदूषण) और विकास कार्यों से जुड़ी खबरों पर चर्चा कराई जाएगी।\r\n \r\n
- \r\n तार्किक क्षमता: सप्ताह में एक दिन अखबारों में आने वाले सुडोकू (Sudoku), वर्ग पहेली और ज्ञानवर्धक क्विज को हल करने की प्रतियोगिता होगी।\r\n \r\n
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कक्षा 6 से 8 के लिए (जूनियर छात्र):
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- \r\n स्क्रैपबुक: इन बच्चों को विज्ञान, पर्यावरण, नई तकनीक और खेल से जुड़ी रोचक खबरों की कटिंग काटकर एक 'स्क्रैपबुक' तैयार करने के लिए प्रेरित किया जाएगा।\r\n \r\n
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विद्यालय की अपनी मैगजीन: आदेश में कहा गया है कि विद्यार्थी अखबारों की डिजाइन और प्रेजेंटेशन से प्रेरणा लें। इसके आधार पर वे मासिक (Monthly) या त्रैमासिक (Quarterly) स्तर पर अपने विद्यालय का समाचार पत्र या मैगजीन तैयार करें। इसका संपादन छात्रों की टीम करेगी, जिसमें स्कूल की उपलब्धियों को खबरों की तरह पेश किया जाएगा।
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4. अभिभावकों की राय: "रील्स की दुनिया से बाहर आएंगे बच्चे"
\r\n\r\nसरकार के इस फैसले का अभिभावकों ने खुले दिल से स्वागत किया है। उनका मानना है कि सोशल मीडिया की 'आधी-अधूरी' जानकारी बच्चों को गुमराह कर रही है।
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अभिभावक शाजिया का कहना है:
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n"यह बहुत ही बेहतरीन कदम है। इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर सिर्फ 'रील्स' होती हैं, जिनमें कोई ठोस इन्फॉर्मेशन नहीं होती। बच्चे अपने आसपास की दुनिया से कट गए हैं। अखबार में हिंदी और अंग्रेजी के गढ़े हुए शब्द होते हैं। जब बच्चे असेंबली में इन्हें पढ़ेंगे, तो उनकी जनरल नॉलेज (GK) तो बढ़ेगी ही, साथ ही भाषा पर पकड़ भी मजबूत होगी।"\r\n
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अभिभावक रवि गुप्ता का दर्द:
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n"मेरे दो बच्चे हैं। कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई मजबूरी थी, लेकिन अब यह आदत बन गई है। बच्चे स्क्रीन पर टाइम बिताते हैं और रोकने पर चिढ़ते हैं। आभासी दुनिया (Virtual World) ने सब कुछ बदल दिया है। पहले हम डिक्शनरी में शब्द खोजते थे, जिससे समझ बढ़ती थी। अब गूगल ने वह मेहनत खत्म कर दी है। अखबार बच्चों को वापस वास्तविकता और धैर्य की ओर लाएंगे।"\r\n
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5. छात्रों की प्रतिक्रिया: "आंखें बचेंगी, नजरिया बदलेगा"
\r\n\r\nसिर्फ बड़े ही नहीं, समझदार छात्र भी इस बदलाव को सकारात्मक मान रहे हैं।
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छात्रा मलीहा हसन कहती हैं:
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n"आजकल हम सब मोबाइल बहुत ज्यादा देखते हैं, जिससे मेरी तरह कई बच्चों को कम उम्र में चश्मा लग गया है। अखबार पढ़ने से हमारी आई-साइट (Eye Sight) पर जोर नहीं पड़ेगा। सबसे बड़ी बात, टीवी या सोशल मीडिया पर हमें अक्सर एक ही पक्ष (One-sided view) दिखाया जाता है, लेकिन अखबार में विस्तार से पढ़ने पर हमें 'फुल पर्सपेक्टिव' मिलेगा। पढ़ने की आदत छूटी जा रही थी, जो अब वापस आएगी।"\r\n
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6. शिक्षकों और विशेषज्ञों का विश्लेषण: "हाइब्रिड मॉडल ही समाधान"
\r\n\r\nशिक्षक इस बात को मानते हैं कि ऑनलाइन शिक्षा को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, लेकिन अखबार की वापसी अनिवार्य थी।
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शिक्षक पीयूष कुशवाहा का मत:
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n"कोविड के बाद ऑनलाइन शिक्षा जरूरत बन गई है, लेकिन इसने बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता (Critical Thinking) को कम किया है। सोशल मीडिया पर वे पढ़ाई के अलावा सब कुछ देख रहे हैं। अखबार एक 'फिल्टर्ड माध्यम' है। वहां भाषा संयमित होती है। ऑफलाइन (अखबार) और ऑनलाइन शिक्षा का संतुलन (Hybrid Model) ही बच्चों का भविष्य सुधार सकता है।"\r\n
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सुलोचना मौर्या (अध्यक्ष, यूपी महिला बेसिक शिक्षक संघ):
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n"जब शिक्षक क्लास में पढ़ाते हैं या बच्चे अखबार हाथ में लेकर पढ़ते हैं, तो उसका मनोवैज्ञानिक असर गहरा होता है। ऑनलाइन क्लास के बाद बच्चे भटक जाते हैं। प्रार्थना सभा में 5 नए शब्द सीखने से साल भर में उनके पास सैकड़ों नए शब्दों का खजाना होगा। यह आगे चलकर प्रतियोगी परीक्षाओं (Competitive Exams) में उनके बहुत काम आएगा।"\r\n
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7. कार्यान्वयन की चुनौती: 15 जनवरी के बाद दिखेगा असर
\r\n\r\nभले ही आदेश जारी हो गया हो, लेकिन इसका जमीनी कार्यान्वयन अभी बाकी है।
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लखनऊ के बीएसए (BSA) विपिन कुमार ने बताया:
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n"शासन का आदेश प्राप्त हो गया है। अभी भीषण ठंड और शीतलहर के कारण स्कूलों में छुट्टियां चल रही हैं। जैसे ही 15 जनवरी के बाद स्कूल खुलेंगे, इस आदेश का अक्षरशः पालन सुनिश्चित कराया जाएगा। यह केवल औपचारिकता नहीं होगी, बल्कि हम सुनिश्चित करेंगे कि बच्चे वास्तव में इससे सीखें।"\r\n
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एक उम्मीद भरी पहल
\r\n\r\nउत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला 'बैक टू बेसिक्स' (Back to Basics) की ओर एक कदम है। एक ऐसे दौर में जब 'अटेंशन स्पैन' (Attention Span) घटकर कुछ सेकंड का रह गया है, अखबार पढ़ने की आदत बच्चों में धैर्य, एकाग्रता और समझ विकसित करेगी। राजस्थान के बाद अब यूपी में यह प्रयोग कितना सफल होता है, यह शिक्षकों की इच्छाशक्ति और प्रशासन की निगरानी पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना तय है कि अगर यह सही से लागू हुआ, तो आने वाली पीढ़ी 'फॉरवर्डेड मैसेज' के ज्ञान पर नहीं, बल्कि 'संपादकीय विश्लेषण' की समझ पर बड़ी होगी।
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यूपी सरकार ने स्कूलों में मोबाइल की लत छुड़ाने के लिए 'न्यूज पेपर रीडिंग' अनिवार्य कर दी है। प्रार्थना सभा में 10 मिनट तक खबरें और 5 नए कठिन शब्द पढ़ाए जाएंगे। कक्षा 9-12 के छात्र संपादकीय पर चर्चा करेंगे, जबकि छोटे बच्चे स्क्रैपबुक बनाएंगे। अभिभावकों और शिक्षकों ने इसे बच्चों की आंखों और मानसिक विकास के लिए एक शानदार कदम बताया है। यह नियम शीतकालीन अवकाश के बाद लागू होगा।
Sabse pehle comment karne wale banein.