नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र और चुनाव प्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए जल्द ही एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकता है। देश में होने वाले चुनावों के दौरान अक्सर 'फर्जी वोटिंग' (Fake Voting), बूथ कैप्चरिंग और किसी दूसरे के नाम पर वोट डालने (Impersonation) की शिकायतें सामने आती रहती हैं। इन तमाम धांधलियों पर हमेशा के लिए पूर्ण विराम लगाने के उद्देश्य से देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) में एक अहम याचिका दायर की गई है।READ ALSO:-मेरठ को मिला नया एसपी सिटी: IPS विनायक गोपाल भोसले ने संभाला कार्यभार; मनचलों, हुड़दंगियों और नशा माफियाओं की अब खैर नहीं
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सुप्रीम कोर्ट सोमवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है, जिसमें भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India - ECI) को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह सभी मतदान केंद्रों (Polling Booths) पर मतदाताओं की पहचान के लिए 'उंगली और आइरिस (आंखों की पुतली) बायोमेट्रिक सिस्टम' को अनिवार्य रूप से लागू करे।
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सुप्रीम कोर्ट का रुख: वर्तमान चुनाव नहीं, लेकिन भविष्य के लिए अहम

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इस अति-संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ (Bench) कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस विषय की गंभीरता को समझा और इसे चुनावी सुधारों की दिशा में एक जरूरी कदम माना।
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पीठ ने क्या कहा? सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि इस याचिका में की गई मांग सैद्धांतिक रूप से सही प्रतीत होती है, लेकिन इसे देश के कुछ राज्यों में चल रहे 'मौजूदा विधानसभा चुनावों' के बीच अचानक से लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसके लिए भारी लॉजिस्टिक और तकनीकी तैयारियों की आवश्यकता होती है। हालांकि, पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि, "अगले संसदीय चुनाव (लोकसभा चुनाव) और/या भविष्य के राज्य विधानसभा चुनावों से पहले इस तरह का बायोमेट्रिक तरीका अपनाया जाना चाहिए या नहीं, इसकी गहनता से जांच और विचार-विमर्श होना चाहिए।" इस टिप्पणी के साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने मामले में केंद्र सरकार (Central Govt), भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और कई राज्यों को नोटिस जारी कर उनसे विस्तृत जवाब तलब किया है।
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क्या है याचिका में? जानिए वकील अश्विनी उपाध्याय की दलीलें

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यह महत्वपूर्ण जनहित याचिका भारतीय जनता पार्टी के नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई है, जो अक्सर चुनावी और कानूनी सुधारों को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाते रहते हैं।
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20 मार्च 2026 का दिया हवाला: याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि इस याचिका को दायर करने का मुख्य कारण (Cause of Action) 20 मार्च 2026 को तब उत्पन्न हुआ, जब यह स्पष्ट हुआ कि निर्वाचन आयोग द्वारा कई सख्त कदम उठाए जाने और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के इस्तेमाल के बावजूद चुनावी धांधलियां रुकने का नाम नहीं ले रही हैं।
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याचिका में कड़े शब्दों में कहा गया है कि, "रिश्वतखोरी, अनुचित प्रभाव, प्रतिरूपण (किसी और की पहचान का इस्तेमाल करके वोट डालना) और डुप्लिकेट मतदान के मामले अभी भी जारी हैं। इस तरह की घटनाओं से पारदर्शी चुनावों में आम जनता का विश्वास कम हो रहा है।"
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चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता और 'वन सिटिजन, वन वोट'

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याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत के आम नागरिकों को इस दूषित व्यवस्था से बहुत अधिक नुकसान हो रहा है।
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    पहचान की चोरी: वर्तमान व्यवस्था में मतदाता पहचान पत्र (Voter ID) या अन्य दस्तावेज दिखाकर वोट डाला जाता है। लेकिन कई बार फर्जी आई-कार्ड बनाकर एक ही व्यक्ति कई अलग-अलग बूथों पर वोट डाल देता है।
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    मृतकों के नाम पर मतदान: वोटर लिस्ट के पूरी तरह से अपडेट न होने के कारण कई बार मृत या पलायन कर चुके लोगों के नाम पर भी फर्जी वोट डाल दिए जाते हैं।
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याचिकाकर्ता का तर्क है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक जनादेश (Constitutional Mandate) को बनाए रखने के लिए, निर्वाचन आयोग को आने वाले सभी चुनावों में पोलिंग बूथों पर 'फिंगरप्रिंट और आईरिस (Iris) बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण' लागू करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
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आधार (Aadhaar) जैसी तकनीक का इस्तेमाल

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याचिका में सुझाव दिया गया है कि इस प्रणाली को भारत में पहले से मौजूद आधार-आधारित पहचान सत्यापन (Aadhaar-based Authentication) के बुनियादी ढांचे की तरह ही लागू किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' (Representation of the People Act) की धारा 23(4) के तहत बायोमेट्रिक पहचान को पहले ही वैध प्रमाण के रूप में मान्यता दी जा चुकी है। जब देश के करोड़ों नागरिकों का बायोमेट्रिक डेटाबेस पहले से मौजूद है, तो उसका इस्तेमाल चुनावी प्रक्रिया को शुद्ध करने के लिए क्यों नहीं किया जा सकता?
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अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग की असीमित शक्तियां

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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 (Article 324) निर्वाचन आयोग को देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए "अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण" (Superintendence, direction and control) की व्यापक और स्वतंत्र शक्तियां प्रदान करता है।
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याचिका में इसी संवैधानिक शक्ति का हवाला देते हुए कहा गया है, "ECI अनुच्छेद 324 के तहत अपनी पूर्ण शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है। वोटर की पहचान को मजबूत करने और रिश्वत, गलत प्रभाव या डुप्लीकेट वोटिंग को जड़ से खत्म करने के लिए उंगली और आइरिस पर आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण लागू करना ECI के अधिकार क्षेत्र में है।"
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बायोमेट्रिक ही क्यों? दस्तावेजों की नकल (Forgery) की जा सकती है, लेकिन बायोमेट्रिक आइडेंटिफायर (उंगलियों के निशान और आंखों की पुतली) दुनिया में हर इंसान के लिए अद्वितीय (Unique) होते हैं और इन्हें किसी भी मशीन या तकनीक से 'बनाया' या 'चुराया' नहीं जा सकता। अगर यह सिस्टम लागू होता है, तो मतदान केंद्र पर मशीन वोटर के अंगूठे या आंख को स्कैन करेगी। यदि वह व्यक्ति पहले ही कहीं वोट डाल चुका है, तो मशीन तुरंत रेड अलर्ट दे देगी। इससे 'एक नागरिक, एक वोट' (One Citizen, One Vote) का लोकतांत्रिक सिद्धांत कागजों से निकलकर जमीनी हकीकत बन सकेगा और यह गारंटी होगी कि हर रजिस्टर्ड वोटर सिर्फ एक ही बार वोट डालेगा।
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भारतीय लोकतंत्र के लिए मील का पत्थर

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सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में नोटिस जारी किया जाना अपने आप में चुनावी सुधारों की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। भारत ने बैलेट पेपर (Ballot Paper) से लेकर ईवीएम (EVM) और वीवीपीएटी (VVPAT) तक का सफर सफलतापूर्वक तय किया है। अब समय आ गया है कि वोटिंग प्रक्रिया को 100% अभेद्य बनाने के लिए बायोमेट्रिक तकनीक को अपनाया जाए।
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अब सबकी निगाहें केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के जवाब पर टिकी हैं। अगर अदालत के दखल के बाद यह हाई-टेक बायोमेट्रिक सिस्टम मतदान केंद्रों पर लागू हो जाता है, तो यह फर्जी वोटिंग के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा और भारतीय चुनाव प्रणाली दुनिया भर के लिए एक आदर्श मिसाल बन जाएगी।
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