नई दिल्ली | ख़बरीलाल डेस्क सोशल मीडिया के दौर में, जहां रीच और कमाई की अंधी दौड़ मची है, वहां सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद गंभीर और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। कोर्ट ने सोशल मीडिया पर कथित मीडियाकर्मी होने का भेष बनाकर आरोपियों की अपमानजनक तस्वीरें और वीडियो पोस्ट करने वालों को सीधे तौर पर 'ब्लैकमेलर' करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने न केवल कथित पत्रकारों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है, बल्कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की जिम्मेदारी पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।READ ALSO:-Zomato का ग्राहकों को बड़ा झटका: फूड डिलीवरी हुई और महंगी, प्लेटफॉर्म फीस में 19% का भारी इजाफा; जानिए अब जेब पर पड़ेगा कितना असर
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ख़बरीलाल की इस विस्तृत रिपोर्ट में समझिए कि आखिर सुप्रीम कोर्ट को इतनी तीखी टिप्पणी क्यों करनी पड़ी, 'डिजिटल अरेस्ट' का क्या मतलब है और इस टिप्पणी का सोशल मीडिया के भविष्य पर क्या असर पड़ने वाला है।
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'डिजिटल अरेस्ट': आरोपियों के मानवाधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी चिंता

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सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की अपमानजनक तस्वीरों और वीडियो को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की प्रथा को "डिजिटल अरेस्ट" का एक वैकल्पिक रूप बताया है।
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    क्या है 'डिजिटल अरेस्ट' का मतलब? कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की है कि यह "डिजिटल अरेस्ट" का एक और प्रारूप है। दुर्भाग्य से, इसे अभी भी अपराध नहीं माना जा रहा है। इसका मतलब है कि सोशल मीडिया पर किसी आरोपी की अपमानजनक तस्वीरें/वीडियो पोस्ट करना उसे समाज की नज़र में पहले ही दोषी ठहरा देना है, बिना किसी कानूनी कार्यवाही के। यह एक तरह का 'ट्रायल बाय मीडिया' है, जो सोशल मीडिया के माध्यम से अंजाम दिया जा रहा है।
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असहनीय दृश्य: हथकड़ी, घसीटे गए और पीटे गए दायर याचिका में आरोपियों की उन तस्वीरों और लघु वीडियो का जिक्र किया गया है, जो कई सोशल मीडिया अकाउंट्स पर अपलोड की जाती हैं। इनमें आरोपियों को:
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    हथकड़ी पहने, रस्सियों से बंधे
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    पीटे गए, घुटनों के बल बैठने को मजबूर किए गए
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    या घसीटे गए
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दिखाया जाता है। ऐसे कंटेट पोस्ट करने वाले कई बार आम क्रिएटर भी होते हैं तो कई बार छोटे कथित न्यूज चैनल। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे कंटेट पर भारी नाराजगी जताई है और इसे आरोपियों के अधिकारों का संभावित उल्लंघन बताया है।
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सोशल मीडिया की रेस: रीच और कमाई के लिए मानवाधिकारों की अनदेखी

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यह सब क्यों हो रहा है? इसका सीधा कारण है सोशल मीडिया पर अपनी रीच यानी लोगों को अपने अकाउंट तक लाने की कोशिश।
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    कमाई का जरिया: किसी भी प्रकार का कंटेंट अपलोड करके सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की रेस में शामिल होना और सोशल मीडिया से कमाई के लिए बिना फिल्टर कंटेट परोसना।
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    सस्ते और सनसनीखेज कंटेंट: सनसनीखेज कंटेंट सबसे ज्यादा व्यूज और एंगेजमेंट लाता है। इसलिए, कथित पत्रकार और इन्फ्लुएंसर्स बिना किसी नैतिक जिम्मेदारी के आरोपियों के अपमानजनक वीडियो अपलोड करते हैं।
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    कानूनी जागरूकता की कमी: कई इन्फ्लुएंसर्स और कथित पत्रकारों को आरोपियों के अधिकारों और मानवाधिकारों के बारे में जानकारी नहीं होती।
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पुलिस आचरण पर जनहित याचिका और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

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सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा, गुजरात, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और असम सहित राज्यों में पुलिस अधिकारियों के आचरण पर चिंता जताने वाली एक जनहित याचिका पर 20 मार्च को सुनवाई हो रही थी। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की है कि सोशल मीडिया पर कुछ संस्थाएं मीडियाकर्मी होने का भेष बदलकर ब्लैकमेलर के रूप में काम कर रही हैं।
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सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस सुनवाई की अध्यक्षता सीजेआई सूर्यकांत की पीठ कर रही थी। कोर्ट का इशारा मुख्य रूप से सोशल मीडिया पर चल रहे कथित मीडिया चैनलों की तरफ था। यह टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण है:
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    वीवीआईपी सुरक्षा और मीडिया जिम्मेदारी: (जयंत चौधरी वाले मामले के संदर्भ में - अगर यह प्रासंगिक हो, तो इसका उल्लेख किया जा सकता है, अन्यथा इसे छोड़ दें।) (इस मामले में आरोपियों के अधिकार और कथित पत्रकारों की जिम्मेदारी मुख्य है।)
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    ऐतिहासिक संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी मीडिया की भूमिका और जिम्मेदारी पर टिप्पणी की है, लेकिन सोशल मीडिया पर कथित पत्रकारों को 'ब्लैकमेलर' बताना एक बहुत ही गंभीर और स्पष्ट संदेश है।
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पुलिस की भूमिका: गाइडलाइंस की अनदेखी और आरोपियों के अधिकारों का उल्लंघन

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सुनवाई के दौरान, पीठ ने याचिकाकर्ताओं को एक संबंधित मामले में अनुपालन के परिणाम की प्रतीक्षा करने को कहा, जिसमें सभी राज्य पुलिस बलों को आरोपी व्यक्तियों के अधिकारों का उल्लंघन करने वाली सामग्री के प्रकाशन पर रोक लगाने वाले दिशानिर्देशों वाली नियमावली को लागू करने के निर्देश पहले ही जारी किए जा चुके थे।
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    क्या हैं वे गाइडलाइंस? सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही पुलिस को आरोपियों के अधिकारों का उल्लंघन करने वाली सामग्री के प्रकाशन पर रोक लगाने के निर्देश दिए थे। इसमें आरोपियों की अपमानजनक तस्वीरें/वीडियो न केवल सोशल मीडिया पर, बल्कि किसी भी मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने पर रोक शामिल थी।
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    गाइडलाइंस की अनदेखी: पुलिस अधिकारियों द्वारा इन निर्देशों की अनदेखी की जा रही है और आरोपियों की अपमानजनक तस्वीरें/वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड की जा रही हैं।
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एक संतुलित और आधुनिक टैक्स ढांचा

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सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और कथित पत्रकारों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। यह आरोपियों के मानवाधिकारों और मीडिया की जिम्मेदारी के बीच संतुलन की बात करती है। आरोपियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कथित पत्रकारों को अब अधिक सतर्क और ईमानदार रहना होगा। सोशल मीडिया को अब आरोपियों के मानवाधिकारों का सम्मान करना होगा।
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