नई दिल्ली: कोरोना महामारी (COVID-19) के दौरान दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान को चलाने वाले भारत में, वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स और उससे हुई मौतों का मुद्दा पिछले कई सालों से एक बड़ी बहस का विषय रहा है। अब, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले पर एक बेहद अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।READ ALSO:-विश्वयुद्ध की आहट, भारत की रसोई और व्यापार में हाहाकार! ईरान जंग से देश में LPG का भीषण संकट; होटलों पर लटके ताले, 'आवश्यक वस्तु अधिनियम' लागू
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जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 2021 से लंबित याचिकाओं पर अपना फैसला देते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह कोविड वैक्सीनेशन के दुष्प्रभावों के शिकार लोगों के लिए 'नो-फॉल्ट कंपनसेशन पॉलिसी' (No-Fault Compensation Policy) तैयार करे। यह फैसला उन परिवारों के लिए न्याय की एक नई किरण लेकर आया है, जिन्होंने वैक्सीन के कथित साइड इफेक्ट्स के कारण अपने बच्चों और प्रियजनों को खो दिया है।
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यह आदेश न केवल कोविड-19 वैक्सीन बल्कि भविष्य में भारत में चलाए जाने वाले किसी भी बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य और टीकाकरण अभियान के लिए एक कानूनी नज़ीर (Precedent) बन गया है। आइए इस पूरे फैसले, इसके पीछे की कानूनी लड़ाई, मेडिकल साइंस और पीड़ित परिवारों की दर्दनाक कहानियों को विस्तार से समझते हैं।
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क्या है 'नो-फॉल्ट कंपनसेशन पॉलिसी' (No-Fault Compensation)?
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट के आदेश का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा 'नो-फॉल्ट कंपनसेशन' का सिद्धांत है। आम कानूनी भाषा में, जब आप मुआवजे की मांग करते हैं, तो आपको यह साबित करना होता है कि सामने वाले (जैसे डॉक्टर, दवा कंपनी या सरकार) की लापरवाही या गलती के कारण आपको नुकसान हुआ है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान में, विशेषकर नई वैक्सीनों के मामले में, यह साबित करना लगभग असंभव होता है।
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'नो-फॉल्ट कम्पनसेशन पॉलिसी' का सीधा अर्थ है: यदि किसी व्यक्ति को किसी अधिकृत दवा या वैक्सीन (जैसे कोवीशील्ड या कोवैक्सिन) के कारण गंभीर नुकसान पहुँचता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसे या उसके आश्रितों को सरकार द्वारा मुआवजा दिया जाएगा। इसके लिए पीड़ित परिवार को यह साबित करने के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे कि इसमें दवा कंपनी (जैसे सीरम इंस्टीट्यूट या भारत बायोटेक) या सरकार की कोई साफ 'गलती' (Fault) थी।
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यह नीति इस सिद्धांत पर काम करती है कि यदि कोई नागरिक व्यापक जनहित और सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health) के लिए वैक्सीन लगवाता है, और कुछ बहुत ही दुर्लभ मामलों (Rare Cases) में उसे इसका नुकसान उठाना पड़ता है, तो राज्य (सरकार) की यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वह उस नागरिक या उसके परिवार की आर्थिक रूप से मदद करे। दुनिया के कई विकसित देशों जैसे अमेरिका (CICP प्रोग्राम) और ब्रिटेन (VDPS) में वैक्सीन इंजरी को लेकर ऐसी नीतियां पहले से लागू हैं।
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सुप्रीम कोर्ट के आदेश की 3 सबसे बड़ी और अहम बातें
\r\n\r\nजस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने अपने फैसले में सरकार और आम जनता के लिए स्थिति पूरी तरह से साफ कर दी है। कोर्ट के आदेश के तीन प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
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1. डेटा में पारदर्शिता (Public Domain Data)
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स (Adverse Events Following Immunization - AEFI) से जुड़े सभी आंकड़े समय-समय पर पब्लिक डोमेन में रखे जाएं। जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि किस वैक्सीन के क्या दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं। इस पारदर्शिता से अफवाहों पर लगाम लगेगी और वैज्ञानिक अनुसंधान को मदद मिलेगी।
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2. कानूनी अधिकार सुरक्षित रहेंगे (Protection of Legal Rights)
\r\n\r\nकोर्ट ने साफ किया है कि इस 'नो-फॉल्ट कंपनसेशन पॉलिसी' के तहत मुआवजा लेने का मतलब यह नहीं होगा कि पीड़ित परिवार के अन्य कानूनी अधिकार खत्म हो गए हैं। यदि कोई व्यक्ति यह साबित करने में सक्षम है कि दवा कंपनी की लापरवाही थी, तो वह इस नीति से इतर, संबंधित कंपनी के खिलाफ दीवानी या आपराधिक मुकदमा (Civil or Criminal Lawsuit) करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
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3. 'मुआवजा' का अर्थ 'गलती मानना' नहीं है (No Admission of Liability)
\r\n\r\nसरकार और फार्मा कंपनियों के बचाव को ध्यान में रखते हुए, कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि सरकार इस नीति के तहत किसी को मुआवजा देती है, तो इसे सरकार या किसी अन्य अथॉरिटी (जैसे स्वास्थ्य मंत्रालय या दवा कंपनी) की 'गलती की स्वीकारोक्ति' (Admission of Fault) नहीं माना जाएगा। यह सिर्फ एक कल्याणकारी कदम (Welfare Measure) है।
\r\n\r\n(इसके साथ ही कोर्ट ने नई कमेटियां बनाने की मांग को खारिज करते हुए कहा कि साइड इफेक्ट्स की मॉनिटरिंग के लिए मौजूदा सरकारी AEFI सिस्टम ही जारी रहेगा, अलग से किसी नए एक्सपर्ट पैनल की जरूरत नहीं है।)
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कैसे शुरू हुई यह कानूनी लड़ाई? (2021 से 2026 तक का सफर)
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट का यह फैसला रातों-रात नहीं आया है। इसके पीछे दो पिताओं का दर्द और उनका लंबा संघर्ष है। यह याचिका मुख्य रूप से रचना गंगू और वेणुगोपालन गोविंदन द्वारा वर्ष 2021 में दायर की गई थी। इन दोनों ने आरोप लगाया था कि उनकी जवान बेटियों की मौत कोविड वैक्सीन के गंभीर साइड इफेक्ट्स के कारण हुई थी।
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केस 1: वेणुगोपालन गोविंदन और उनकी बेटी 'करुण्या' का मामला
\r\n\r\nवेणुगोपालन गोविंदन ने मई 2024 में अपने हलफनामे और दावों के जरिए देश का ध्यान खींचा था। उनकी बेटी करुण्या ने जुलाई 2021 में 'कोवीशील्ड' (Covishield) वैक्सीन ली थी। वैक्सीन लेने के लगभग एक महीने के भीतर ही करुण्या की तबीयत बिगड़ी और उसकी मौत हो गई।
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जब परिवार ने शिकायत की, तो सरकार ने मामले की जांच के लिए एक राष्ट्रीय समिति का गठन किया। हालांकि, उस समय समिति ने अपने निष्कर्ष में कहा था कि करुण्या की मौत और वैक्सीन के बीच सीधे संबंध (Causality) के 'पर्याप्त सबूत' नहीं मिले हैं। लेकिन गोविंदन ने हार नहीं मानी और कानूनी लड़ाई जारी रखी।
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केस 2: 8 साल की 'रितिका' (श्री ओमत्री) का दर्दनाक अंत
\r\n\r\nदूसरी कहानी और भी ज्यादा दिल दहला देने वाली थी। श्री ओमत्री के परिवार के अनुसार, उनकी 8 साल की बेटी रितिका ने मई 2021 में कोवीशील्ड की पहली डोज लगवाई थी।
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- \r\n लक्षण: डोज लगने के मात्र 7 दिनों के भीतर रितिका को बहुत तेज बुखार आया और लगातार उल्टियां (Vomiting) होने लगीं।\r\n \r\n
- \r\n मेडिकल रिपोर्ट: जब डॉक्टरों ने उसका MRI स्कैन किया, तो वे हैरान रह गए। रितिका के ब्रेन (दिमाग) में ब्लड क्लॉटिंग (खून के थक्के) हो गई थी, जिसके कारण उसे 'ब्रेन हेमरेज' (Brain Hemorrhage) हो गया।\r\n \r\n
- \r\n मौत: अस्पताल में भर्ती होने के महज दो हफ्ते बाद उस मासूम की मौत हो गई।\r\n \r\n
- \r\n RTI से हुआ खुलासा: परिवार ने अपनी बेटी की मौत का असली कारण जानने के लिए दिसंबर 2021 में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जानकारी मांगी। RTI के जवाब में चौंकाने वाला सच सामने आया। पता चला कि रितिका को 'थ्रोम्बोसिस विथ थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम' (TTS) हुआ था, जो सीधे तौर पर वैक्सीन का ही एक बेहद दुर्लभ साइड इफेक्ट था। सरकारी दस्तावेजों में भी माना गया कि 'वैक्सीन उत्पाद संबंधी प्रतिक्रिया' (Vaccine Product Related Reaction) के कारण ही उसकी मृत्यु हुई थी।\r\n \r\n
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क्या है TTS (थ्रोम्बोसिस विथ थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम)?
\r\n\r\nजब रितिका के मामले में TTS का जिक्र आया, तो पूरे देश में हड़कंप मच गया था। आम भाषा में समझें तो TTS एक ऐसी दुर्लभ मेडिकल कंडीशन है, जो कुछ एडिनोवायरस-वेक्टर टीकों (जैसे एस्ट्राजेनेका/कोवीशील्ड) के बाद सामने आ सकती है।
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- \r\n थ्रोम्बोसिस (Thrombosis): इसका मतलब है शरीर की नसों या धमनियों में खून के थक्के (Blood Clots) जम जाना। यह अक्सर दिमाग (Cerebral Venous Sinus Thrombosis) या पेट में होता है।\r\n \r\n
- \r\n थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (Thrombocytopenia): इसका मतलब है शरीर में प्लेटलेट्स (Platelets) की संख्या का अचानक और बहुत तेजी से गिर जाना।\r\n \r\n
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सामान्यतः जब शरीर में खून के थक्के जमते हैं, तो प्लेटलेट्स ज्यादा होते हैं, लेकिन TTS एक ऐसा अजीब और खतरनाक सिंड्रोम है जहां थक्के भी जम रहे होते हैं और प्लेटलेट्स भी कम हो रहे होते हैं, जिससे इंसान को एक ही समय में क्लॉटिंग और ब्लीडिंग दोनों का खतरा होता है। यही कारण था कि रितिका को ब्रेन हेमरेज हुआ।
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मई 2024: जब एस्ट्राजेनेका ने कोर्ट में मानी अपनी गलती
\r\n\r\nभारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) ने ब्रिटिश फार्मास्यूटिकल कंपनी 'एस्ट्राजेनेका' (AstraZeneca) के साथ मिलकर और उनके ही फॉर्मूले पर 'कोवीशील्ड' का निर्माण किया था।
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भारत में कानूनी लड़ाई चल ही रही थी कि मई 2024 में एस्ट्राजेनेका ने ब्रिटिश हाईकोर्ट (यूके) में चल रहे एक क्लास-एक्शन मुकदमे में आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर लिया कि उनकी कोविड-19 वैक्सीन से बहुत ही दुर्लभ मामलों में खतरनाक साइड इफेक्ट्स, विशेष रूप से TTS, हो सकते हैं। इस स्वीकारोक्ति ने भारत में चल रहे सुप्रीम कोर्ट के केस को और मजबूती दे दी और याचिकाकर्ताओं के दावों पर मुहर लगा दी।
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सरकार का 2022 का तर्क: "वैक्सीन लगवाना लोगों की अपनी मर्जी थी"
\r\n\r\nइस पूरे मामले में केंद्र सरकार का रुख भी चर्चा का विषय रहा है। वर्ष 2022 में, जब याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी, तो सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक जवाबी हलफनामा (Affidavit) दायर किया था।
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सरकार ने तर्क दिया था कि वह कानूनी रूप से किसी भी मुआवजे के लिए 'उत्तरदायी' (Liable) नहीं है। सरकार की दलील थी कि:
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- \r\n कोविड-19 का टीकाकरण अभियान पूरी तरह से स्वैच्छिक (Voluntary) था। सरकार ने किसी भी नागरिक के साथ वैक्सीन लगवाने के लिए जबरदस्ती नहीं की।\r\n \r\n
- \r\n लोगों ने अपनी मर्जी से यह फैसला लिया था।\r\n \r\n
- \r\n वैक्सीन से जुड़े संभावित फायदों और इसके दुर्लभ जोखिमों (Risks) के बारे में जानकारी पब्लिक डोमेन में थी। इसलिए, जोखिम जानने के बावजूद अगर किसी ने वैक्सीन लगवाई और उसे नुकसान हुआ, तो सरकार उसकी भरपाई के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है।\r\n \r\n
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इससे पहले सरकार ने केरल हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें सईदा के.ए. की एक अन्य याचिका पर राज्य को मुआवजे की नीति तैयार करने का आदेश दिया गया था।
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लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की इस 'स्वैच्छिक' वाली दलील से असहमति जताते हुए स्पष्ट किया कि कल्याणकारी राज्य (Welfare State) में, जब सरकार महामारी को रोकने के लिए इतने बड़े पैमाने पर अभियान चलाती है और वैक्सीन सर्टिफिकेट को यात्रा या काम के लिए लगभग अनिवार्य जैसा बना दिया जाता है, तो राज्य अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।
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जुलाई 2025 की ICMR स्टडी: क्या वैक्सीन से आ रहे हैं हार्ट अटैक?
\r\n\r\nजब वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स की बहस चल रही थी, उसी दौरान देश भर में अचानक होने वाली मौतों (विशेषकर युवाओं में जिम करते हुए, नाचते हुए या चलते-फिरते हार्ट अटैक) के कई वीडियो सामने आने लगे। लोगों में भारी दहशत फैल गई कि कहीं इन मौतों का कारण कोविड वैक्सीन तो नहीं है।
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इस डर को दूर करने के लिए भारत की सर्वोच्च स्वास्थ्य अनुसंधान संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) ने जुलाई 2025 में एक विस्तृत स्टडी (अध्ययन) जारी की।
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स्टडी के मुख्य निष्कर्ष:
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- \r\n कोई सीधा संबंध नहीं: स्टडी में स्पष्ट रूप से दावा किया गया कि 18 से 45 साल के युवाओं में हार्ट अटैक से होने वाली 'अचानक मौतों' (Sudden Deaths) का कोविड वैक्सीन से कोई सीधा या सांख्यिकीय संबंध (Statistical Link) नहीं है।\r\n \r\n
- \r\n वैक्सीन सेफ है: स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस स्टडी के आधार पर देश को आश्वस्त किया कि भारत की कोविड वैक्सीन (कोवैक्सिन और कोवीशील्ड) पूरी तरह से 'सेफ और इफेक्टिव' (सुरक्षित और प्रभावी) हैं। इनसे होने वाले गंभीर साइडइफेक्ट्स के मामले बेहद दुर्लभ (Rare) हैं।\r\n \r\n
- \r\n अचानक मौतों के अन्य कारण: स्टडी में बताया गया कि कोविड के बाद हो रही अचानक मौतों की असली वजहें कुछ और हैं। इनमें आनुवंशिकी (Genetics), खराब जीवनशैली (Lifestyle), पहले से मौजूद बीमारियां (Co-morbidities), अत्यधिक शराब/धूम्रपान और गंभीर 'लॉन्ग कोविड' (Long Covid Complications) शामिल हैं, न कि वैक्सीन।\r\n \r\n
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ICMR की इस स्टडी ने एक तरफ तो आम जनता को हार्ट अटैक के डर से राहत दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में चल रहे रितिका और करुण्या जैसे दुर्लभ (TTS) मामलों की गंभीरता को कम नहीं किया, क्योंकि वे सीधे तौर पर वैक्सीन से जुड़े हुए साबित हो रहे थे।
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फैसले का घटनाक्रम (Timeline of the SC Verdict)
\r\n\r\nइस ऐतिहासिक फैसले तक पहुंचने की टाइमलाइन कुछ इस प्रकार रही है:
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- \r\n वर्ष 2021: देश में टीकाकरण अभियान चरम पर। रचना गंगू और वेणुगोपालन गोविंदन ने अपनी बेटियों की मौत के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।\r\n \r\n
- \r\n वर्ष 2022: केंद्र सरकार ने हलफनामा दिया कि वैक्सीन स्वैच्छिक थी, अतः मुआवजे की देयता नहीं बनती।\r\n \r\n
- \r\n मई 2024: ब्रिटिश कोर्ट में एस्ट्राजेनेका ने माना कि कोवीशील्ड फॉर्मूले से TTS जैसे दुर्लभ साइड इफेक्ट संभव हैं।\r\n \r\n
- \r\n जुलाई 2025: ICMR और NCDC ने 'सडन डेथ' पर स्टडी जारी कर बताया कि अचानक हार्ट अटैक का कारण वैक्सीन नहीं है।\r\n \r\n
- \r\n 13 नवंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट में इन याचिकाओं पर मैराथन बहस पूरी हुई। जस्टिस विक्रम नाथ ने यह कहते हुए फैसला सुरक्षित (Reserve) रख लिया था कि, "हम तय करेंगे कि समिति का गठन किया जाना है या नहीं, क्या निर्देश जारी किए जाने हैं। हम हर चीज की बारीकी से जांच करेंगे।"\r\n \r\n
- \r\n मार्च 2026 (वर्तमान): सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए सरकार को 'नो-फॉल्ट कंपनसेशन पॉलिसी' बनाने का अंतिम आदेश दिया।\r\n \r\n
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भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य इतिहास में एक मील का पत्थर
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा। इस फैसले ने यह स्थापित कर दिया है कि विज्ञान और दवाइयां पूर्णतः अचूक नहीं हो सकती हैं, लेकिन जब कोई नागरिक देश के हित में उन दवाओं पर भरोसा करता है, तो दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में देश उसे अकेला नहीं छोड़ सकता।
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अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। सरकार को जल्द ही इस 'नो-फॉल्ट कंपनसेशन पॉलिसी' का एक मसौदा (Draft) तैयार करना होगा, जिसमें यह तय किया जाएगा कि मुआवजे की राशि कितनी होगी, आवेदन की प्रक्रिया क्या होगी, और यह कैसे तय किया जाएगा कि अमुक मौत या बीमारी वाकई वैक्सीन का साइड इफेक्ट है या कुछ और।
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यह फैसला न केवल कोरोना वैक्सीन पीड़ितों के घावों पर मरहम लगाएगा, बल्कि भविष्य में भारत के लोगों का सरकारी टीकाकरण कार्यक्रमों (Immunization Programs) के प्रति विश्वास भी बढ़ाएगा, क्योंकि अब उन्हें पता होगा कि अगर कुछ गलत होता है, तो एक पारदर्शी व्यवस्था उनके साथ खड़ी है।
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Sabse pehle comment karne wale banein.