मेरठ (छोटा मवाना): शिक्षा के मंदिरों को जहां स्वच्छ और सुरक्षित होना चाहिए, वहीं मेरठ जिले के छोटा मवाना स्थित एक प्रमुख विद्यालय प्रशासनिक लापरवाही और अनदेखी का शिकार हो गया है। सोमवार, 13 अप्रैल 2026 को छोटा मवाना के प्रसिद्ध जवाहर इण्टर कॉलेज के छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और प्रबंध समिति के सदस्यों का गुस्सा आखिर फूट पड़ा। स्कूल के ठीक सामने खोदे गए अवैध और गंदे पानी के नाले, जलभराव और उसके कारण हो रहे जानलेवा हादसों के विरोध में पूरे स्कूल ने सड़क पर उतरकर विशाल प्रदर्शन किया।READ ALSO:-LPG गैस उपभोक्ताओं के लिए बड़ी खबर: देश में एलपीजी की सप्लाई पूरी तरह स्थिर, सरकार ने दी पैनिक बाइंग से बचने की सलाह; अब बिना एड्रेस प्रूफ मिलेगा 5KG का सिलेंडर
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स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि आक्रोशित छात्रों और स्टाफ के सड़क पर बैठने के कारण वहां भारी ट्रैफिक जाम लग गया। यह प्रदर्शन उस गूंगे और बहरे प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ एक चेतावनी है, जो बार-बार लिखित शिकायतें देने के बावजूद कुंभकर्णी नींद सोया हुआ है।
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क्या है पूरा मामला? कैसे बना स्कूल के लिए खतरा

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जवाहर इण्टर कॉलेज, छोटा मवाना क्षेत्र के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में से एक है, जहां हजारों बच्चे अपना भविष्य संवारने आते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से स्कूल का वातावरण पढ़ाई के अनुकूल रहने के बजाय एक 'डेंजर जोन' (Danger Zone) में तब्दील हो गया है।
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विद्यालय प्रबंधन (प्रबंधक एवं प्रधानाचार्य) द्वारा जारी की गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, कुछ समय पहले बिना किसी पूर्व सूचना और वैध अनुमति के विद्यालय के मुख्य गेट के ठीक सामने से एक अवैध नाला खोद दिया गया। इस नाले में पूरे इलाके का गंदा और बदबूदार पानी जमा होता है।
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नाले ने ली पेड़ की बलि, स्कूल की इमारत हुई धराशायी

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इस अवैध नाले की वजह से स्कूल की नींव और आसपास की जमीन लगातार खोखली हो रही है। इसी नाले के गंदे पानी के बीच यूकेलिप्टस (सफेदा) के कई लंबे और पुराने पेड़ खड़े हुए थे। पानी भराव के कारण पेड़ों की जड़ें कमजोर हो गईं और हाल ही में एक विशाल यूकेलिप्टस का पेड़ भरभराकर विद्यालय के एक कमरे के ऊपर गिर गया।
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गनीमत यह रही कि जिस समय यह भारी पेड़ कमरे की छत पर गिरा, उस वक्त वहां कोई छात्र मौजूद नहीं था, अन्यथा एक बहुत बड़ा और जानलेवा हादसा हो सकता था। इस हादसे में स्कूल के उस कमरे की छत और दीवार पूरी तरह से टूटकर ढह गई है, जिससे विद्यालय को भारी आर्थिक नुकसान भी हुआ है।
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प्रशासन की बेरुखी और अनसुनी से फूटा गुस्सा

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लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब नागरिक परेशान होते हैं, तो वे प्रशासन का दरवाजा खटखटाते हैं। जवाहर इण्टर कॉलेज के प्रबंधन ने भी यही किया। प्रबंध समिति के अध्यक्ष, प्रबंधक और प्रधानाचार्य ने इस गंभीर समस्या, इमारत के नुकसान और बच्चों की जान को होने वाले खतरे के बारे में स्थानीय प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को कई बार लिखित और मौखिक शिकायतें दीं।
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हैरानी की बात यह है कि शिक्षा विभाग और स्थानीय नगर निकाय/प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। किसी भी अधिकारी ने मौके पर आकर मुआयना करने या इस अवैध नाले को बंद कराने की जहमत नहीं उठाई। इसी 'लाल फीताशाही' और सरकारी लेटलतीफी से आजिज आकर सोमवार को विद्यालय परिवार को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा।
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सड़क पर उतरे छात्र: गूंजे नारे, लगा लंबा जाम

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सोमवार सुबह जब स्कूल खुला, तो छात्रों का गुस्सा सातवें आसमान पर था। पढ़ाई छोड़कर विद्यालय के सभी छात्र-छात्राएं, पूरा टीचिंग और नॉन-टीचिंग स्टाफ, प्रधानाचार्य और प्रबंध समिति के लोग स्कूल के बाहर मुख्य सड़क पर आ गए। उन्होंने स्कूल के सामने बनी इस नारकीय स्थिति के खिलाफ उग्र लेकिन शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
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प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने लगाए ये प्रमुख नारे:

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    "गंदगी हटाओ, स्कूल बचाओ!"
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    "क्रीडा स्थल (Playground) पर भरे गंदे पानी से छुटकारा दिलाओ!"
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    "स्कूल गेट के सामने से अवैध नाला तुरंत हटाओ!"
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    "प्रशासन होश में आओ!"
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इस बड़े विरोध प्रदर्शन के कारण छोटा मवाना की मुख्य सड़क पर यातायात पूरी तरह से ठप हो गया। सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी-लंबी कतारें लग गईं और दूर तक जाम की स्थिति बनी रही। राहगीरों और आम जनता को भी हालांकि जाम से परेशानी हुई, लेकिन जब उन्हें स्कूल के बच्चों की समस्या और प्रशासन की लापरवाही का पता चला, तो स्थानीय लोगों ने भी छात्रों की इस जायज मांग का समर्थन किया।
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बच्चों के स्वास्थ्य और भविष्य पर मंडराता गंभीर खतरा

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यह मामला सिर्फ एक पेड़ गिरने या दीवार टूटने तक सीमित नहीं है; यह हजारों मासूम बच्चों के स्वास्थ्य और उनके सर्वांगीण विकास से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है:
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    खेल के मैदान (Playground) की बर्बादी: स्कूल के क्रीडा स्थल पर इस नाले का गंदा पानी भर गया है। जो मैदान बच्चों के खेलने, दौड़ने और शारीरिक विकास के लिए होता है, वह आज दलदल और गंदे तालाब में तब्दील हो चुका है। इससे बच्चों की खेलकूद गतिविधियां पूरी तरह ठप हो गई हैं।
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    भयंकर बीमारियों का न्यौता: अप्रैल का महीना चल रहा है और गर्मियां शुरू हो चुकी हैं। गंदे पानी के इस भराव के कारण वहां मच्छरों की भारी पैदावार हो रही है। यह नाला डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया और टाइफाइड जैसी जानलेवा बीमारियों का हॉटस्पॉट बन गया है।
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    दुर्गंध से पढ़ाई में बाधा: कक्षा के अंदर बैठे बच्चों को इस नाले से उठने वाली भयंकर दुर्गंध का सामना करना पड़ता है। ऐसी अस्वच्छ और बदबूदार हवा में बच्चों का पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर पाना असंभव है।
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    सुरक्षा का खतरा: टूटी हुई दीवार और छत वाले कमरों के आसपास बच्चों का जाना खतरे से खाली नहीं है। इसके अलावा, नाले के किनारे खड़े अन्य पेड़ भी कभी भी गिर सकते हैं।
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विद्यालय प्रबंधन की प्रमुख मांगें

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जवाहर इण्टर कॉलेज के प्रधानाचार्य और प्रबंध समिति ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से प्रशासन के सामने अपनी स्पष्ट मांगें रखी हैं:
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    अवैध नाले को तुरंत बंद किया जाए: विद्यालय के मुख्य द्वार के सामने खोदे गए इस अवैध नाले को तत्काल प्रभाव से मिट्टी डालकर भरा जाए और पानी की निकासी का कोई वैकल्पिक और सुरक्षित प्रबंध किया जाए।
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    क्रीडा स्थल की सफाई: मैदान में भरे गंदे पानी को निकालकर वहां की साफ-सफाई और कीटनाशकों का छिड़काव किया जाए।
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    क्षतिग्रस्त इमारत का मुआवजा: नाले के कारण जो पेड़ गिरा और जिससे स्कूल की छत/दीवार टूटी है, प्रशासन उसकी मरम्मत कराए या उचित मुआवजा दे।
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    खतरनाक पेड़ों की कटाई: जो पेड़ अभी भी गंदे पानी के कारण कमजोर हो चुके हैं और भविष्य में गिर सकते हैं, उन्हें सुरक्षित तरीके से हटवाया जाए।
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जवाहर इण्टर कॉलेज, छोटा मवाना का यह विरोध प्रदर्शन इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे प्रशासनिक लापरवाही एक अच्छे-खासे शैक्षणिक माहौल को बर्बाद कर सकती है। छात्र देश का भविष्य होते हैं, और अगर वे अपनी कक्षाओं में बैठकर पढ़ने के बजाय अपने ही स्कूल की सुरक्षा के लिए सड़कों पर उतरकर जाम लगाने को मजबूर हैं, तो यह व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
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अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस भारी विरोध प्रदर्शन और सड़क जाम के बाद क्या मेरठ का जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग और संबंधित नगर निकाय अपनी नींद से जागते हैं? क्या डीएम (DM) मेरठ इस मामले का संज्ञान लेकर छात्रों को गंदगी और बीमारियों के इस नरक से मुक्ति दिलाएंगे, या फिर किसी और बड़े हादसे का इंतजार किया जाएगा? समय आ गया है कि शिक्षा के मंदिरों को राजनीति और प्रशासनिक लापरवाही का अड्डा बनने से रोका जाए।
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