नई दिल्ली: देश की संसदीय व्यवस्था में केंद्र सरकार एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव करने की तैयारी कर रही है। भारत की बढ़ती आबादी और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को और अधिक व्यापक बनाने के लिए सरकार ने लोकसभा (Lok Sabha) की कुल सीटों की संख्या बढ़ाने का एक अहम प्रस्ताव रखा है। इस नई योजना के तहत वर्तमान में 543 लोकसभा सीटों की संख्या को बढ़ाकर 850 करने का खाका तैयार किया जा रहा है। सरकार का यह कदम केवल सीटों को बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश में बहुप्रतीक्षित 'महिला आरक्षण कानून' (Women's Reservation Bill) को लागू करने का रास्ता भी साफ करेगा।READ ALSO:-मेरठ सेंट्रल मार्केट सीलिंग: घर छिनने के डर से सड़क पर उतरा व्यापारियों का परिवार, छोटे बच्चों ने पूछा- "अब हमारी पढ़ाई कौन कराएगा?"
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क्या है 131वां संविधान संशोधन और सीटों का नया गणित?
\r\n\r\nसरकार की योजना के अनुसार, इस बड़े बदलाव को अमलीजामा पहनाने के लिए संसद में प्रस्तावित 131वां संविधान संशोधन लाया जाएगा। इसके तहत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 81 (Article 81) में बदलाव किया जाएगा।
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प्रस्ताव के मुतबाकि, 850 सीटों का बंटवारा कुछ इस प्रकार होगा:
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- \r\n राज्यों की हिस्सेदारी: देश के सभी राज्यों के लिए कुल 815 सीटें निर्धारित की जाएंगी।\r\n \r\n
- \r\n केंद्र शासित प्रदेश: दिल्ली, चंडीगढ़, पुडुचेरी जैसे सभी केंद्र शासित प्रदेशों (Union Territories) के हिस्से में 35 सीटें आएंगी।\r\n \r\n
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हालांकि, सीटों में यह बंपर बढ़ोतरी रातों-रात नहीं होगी। यह पूरा बदलाव डिलिमिटेशन (परिसीमन) की जटिल प्रक्रिया के पूरी होने के बाद ही लागू किया जाएगा। परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) नई जनगणना (Census) के आंकड़ों के आधार पर पूरे देश में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का पुनर्निर्धारण करेगा।
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नारी शक्ति वंदन अधिनियम: महिला आरक्षण से सीधा कनेक्शन
\r\n\r\nलोकसभा सीटों को बढ़ाने की इस ऐतिहासिक पहल को सीधे तौर पर 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (महिला आरक्षण कानून) से जोड़ा जा रहा है।
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- \r\n महिलाओं को मिलेगा 33% हक: इस नए कानून के तहत देश की लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं में कुल सीटों का 33 प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षित (Reserved) किया जाना है।\r\n \r\n
- \r\n परिसीमन है अनिवार्य शर्त: सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि महिला आरक्षण का यह ऐतिहासिक कानून तब तक जमीन पर लागू नहीं हो सकता, जब तक कि देश में परिसीमन की प्रक्रिया पूरी न हो जाए। सीटों की संख्या 850 होने के बाद, इसका एक-तिहाई हिस्सा (लगभग 283 सीटें) महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएगा।\r\n \r\n
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संसद में पास कराना एक बड़ी चुनौती
\r\n\r\nचूंकि सीटों की संख्या बढ़ाने और परिसीमन से जुड़ा यह मामला सीधे तौर पर संविधान के मूल ढांचे से जुड़ा है, इसलिए इसे संसद के दोनों सदनों में पारित कराना एक बड़ी चुनौती होगी।
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- \r\n यह एक 'संविधान संशोधन विधेयक' है, जिसे लोकसभा और राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत (Two-thirds Majority) के साथ पास कराना अनिवार्य होगा।\r\n \r\n
- \r\n वर्तमान संख्या बल के हिसाब से अकेले लोकसभा में इस बिल को पास कराने के लिए सरकार को करीब 362 सांसदों के भारी समर्थन की आवश्यकता होगी। हालांकि, सरकार को पूरा भरोसा है कि महिला आरक्षण के इस संवेदनशील और जरूरी मुद्दे पर उसे विपक्ष सहित विभिन्न राजनीतिक दलों का समर्थन आसानी से मिल जाएगा।\r\n \r\n
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नया राजनीतिक संग्राम: उत्तर बनाम दक्षिण भारत का विवाद
\r\n\r\nजहां एक ओर केंद्र सरकार परिसीमन का बिल लाने की पूरी तैयारी में है, वहीं दूसरी ओर इस मुद्दे ने देश में उत्तर बनाम दक्षिण (North vs South) की सियासत को एक बार फिर सुलगा दिया है। दक्षिण भारत के राज्यों में इस परिसीमन को लेकर भारी आशंकाएं और राजनीतिक बेचैनी बढ़ रही है।
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- \r\n क्या है दक्षिण का डर? तमिलनाडु में सत्तासीन डीएमके (DMK) के प्रमुख और मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा है कि केवल 'जनसंख्या के आधार' पर होने वाला परिसीमन दक्षिण के राज्यों के साथ घोर अन्याय होगा।\r\n \r\n
- \r\n सजा या इनाम: दक्षिण भारतीय नेताओं का तर्क है कि उनके राज्यों ने दशकों तक परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण (Population Control) की राष्ट्रीय नीतियों को सख्ती से लागू किया और सफलता पाई। वहीं, उत्तर भारत के राज्यों (जैसे यूपी, बिहार) में जनसंख्या तेजी से बढ़ी। अगर सिर्फ जनसंख्या को आधार बनाया गया, तो संसद में उत्तर भारत की सीटें बेतहाशा बढ़ जाएंगी और दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व (Representation) और राजनीतिक संतुलन कम हो जाएगा। स्टालिन का कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहने वाले राज्यों को इनाम मिलने के बजाय सजा नहीं मिलनी चाहिए।\r\n \r\n
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गृह मंत्री अमित शाह का स्पष्टीकरण और आश्वासन
\r\n\r\nदक्षिण के राज्यों में उठ रहे इन विरोध के स्वरों और आशंकाओं को शांत करने के लिए केंद्र सरकार ने भी अपना रुख स्पष्ट किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने संसद और सार्वजनिक मंचों से इन आशंकाओं को सिरे से खारिज किया है।
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शाह ने स्पष्ट शब्दों में आश्वासन दिया है कि परिसीमन की प्रक्रिया में दक्षिण के किसी भी राज्य को राजनीतिक रूप से कोई नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत होने वाली इस प्रक्रिया में इस बात का पूरा ध्यान रखा जाएगा कि सभी राज्यों का संसद में उचित और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व बना रहे।
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कुल मिलाकर, भारतीय राजनीति एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। एक तरफ जहां परिसीमन और सीटों का विस्तार महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बहुत बड़ा और अहम कदम माना जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखना मोदी सरकार के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होगी। आने वाले संसद सत्रों में यह मुद्दा देश की राजनीति के केंद्र में रहने वाला है।
Sabse pehle comment karne wale banein.