वीकेंड का इंतजार, दोस्तों का साथ और हाथ में ठंडी बीयर की कैन या पसंदीदा व्हिस्की का पैग—भारत में करोड़ों लोगों के लिए यह तनाव दूर करने का एक आम तरीका है। लेकिन, आने वाले दिनों में यह 'रिलैक्सेशन' आपकी जेब पर बहुत भारी पड़ने वाला है। अगर आप सोच रहे हैं कि आपकी पसंदीदा शराब की कीमत सिर्फ सरकार के टैक्स बढ़ाने से बढ़ती है, तो आप गलत हैं। इस बार आपके जाम में जो 'महंगाई' घुल रही है, उसकी असली वजह सात समंदर पार पश्चिम एशिया (Middle East) में चल रहा युद्ध और ग्लोबल सप्लाई चेन का चरमराना है।READ ALSO:-खौफनाक हादसा: दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पर आग का गोला बनी स्विफ्ट कार, CNG ब्लास्ट के बाद चलती गाड़ी से कूदकर युवक ने बचाई जान!
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भारत के सबसे बड़े शराब और बीयर उद्योग निकायों ने साफ शब्दों में चेतावनी दे दी है कि अगर राज्य सरकारों ने तुरंत प्रभाव से कीमतों में 15 प्रतिशत तक की वृद्धि नहीं की, तो बाजार में शराब की भयंकर किल्लत हो जाएगी और कई कंपनियों को अपने कारखानों पर ताला लगाना पड़ सकता है। आइए, इस पूरी खबर का 360-डिग्री विश्लेषण करते हैं और समझते हैं कि कैसे एक विदेशी संकट आपके घर के पास वाले ठेके (Liquor Shop) के रेट बोर्ड को बदलने वाला है।
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ग्लोबल क्राइसिस का लोकल असर (Geopolitics Meets the Bar Counter)

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अक्सर एक आम उपभोक्ता के मन में यह सवाल उठता है कि जब शराब भारत में ही बन रही है (जिसे IMFL - Indian Made Foreign Liquor कहा जाता है), तो फिर दुबई, ईरान या इजरायल के पास हो रहे युद्ध से इसके दाम क्यों बढ़ेंगे? इसका सीधा और सटीक जवाब है— ऊर्जा संकट और पैकेजिंग (Energy Crisis & Packaging)।
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शराब बनाने की प्रक्रिया सिर्फ अनाज, अंगूर या गन्ने को सड़ाकर अल्कोहल निकालने तक सीमित नहीं है। उस तरल पदार्थ (Liquid) को सुरक्षित रूप से उपभोक्ता तक पहुंचाने के लिए एक बेहद जटिल और खर्चीली पैकेजिंग प्रक्रिया की जरूरत होती है। इस पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाली हर चीज—चाहे वह कांच की बोतल हो, प्लास्टिक का ढक्कन हो, या एल्युमिनियम की कैन—प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कच्चे तेल (Crude Oil) और प्राकृतिक गैस (Natural Gas) पर निर्भर करती है।
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पश्चिम एशिया दुनिया भर में कच्चे तेल और ऊर्जा का 'हार्टलैंड' (Heartland) है। वहां जारी तनाव के कारण:

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    अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी अस्थिरता आ गई है।
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  2. \r\n
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    समुद्री व्यापार के प्रमुख रास्तों (जैसे लाल सागर) में जहाजों की आवाजाही बाधित हुई है।
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  5. \r\n
    ट्रांसपोर्टेशन और माल ढुलाई (Freight Charges) का खर्च कई गुना बढ़ गया है।
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नतीजतन, भारत में शराब बनाने वाली कंपनियों की 'इनपुट कॉस्ट' (Input Cost) यानी उत्पादन लागत उस स्तर पर पहुंच गई है, जिसे उद्योग की भाषा में "असहनीय" (Unbearable) कहा जा रहा है।
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पैकेजिंग सेक्टर में हाहाकार (The Raw Material Nightmare)

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'कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन अल्कोहलिक बेवरेज कंपनीज' (CIABC) के महानिदेशक अभिनव गिरी ने उद्योग की वर्तमान स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया है। उनके अनुसार, शराब के अंदर के लिक्विड से ज्यादा अब उसे पैक करने का खर्च बढ़ गया है। आइए इसे अलग-अलग हिस्सों में बांटकर समझते हैं:
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1. कांच की बोतलें (Glass Bottles) और 'गैस' का खेल

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शराब उद्योग की रीढ़ कांच की बोतलें हैं। कांच बनाने के लिए रेत (Silica) को भयंकर तापमान पर पिघलाना पड़ता है, जिसके लिए प्राकृतिक गैस (LNG - Liquefied Natural Gas) से चलने वाली भट्ठियों का इस्तेमाल होता है।
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    युद्ध के कारण LNG की ग्लोबल सप्लाई चेन टूट गई है।
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    भारत में सरकारी कंपनी GAIL (गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड) ने घरेलू कांच उद्योगों को दी जाने वाली गैस की आपूर्ति में 40% तक की भारी कटौती कर दी है।
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    गैस न मिलने के कारण कांच निर्माताओं को महंगे ईंधनों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे बोतलों के दाम रातों-रात 8% से 12% तक बढ़ गए हैं।
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2. प्लास्टिक के ढक्कन (Caps & Closures) और कच्चे तेल की मार

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आप बोतल का जो ढक्कन खोलते हैं या जो प्लास्टिक का 'पोरर' (Pourer) बोतल के मुंह पर लगा होता है, वह पॉलिमर (Polymers) से बनता है। मुख्य रूप से इसमें PP (Polypropylene) और HDPE (High-Density Polyethylene) का इस्तेमाल होता है, जो कच्चे तेल के रिफाइनिंग से निकलते हैं (Petrochemicals)।
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    क्रूड ऑयल के महंगा होने से, भारत में इन पॉलिमर्स की कीमतों में महज एक महीने के भीतर 30% से 35% का भयंकर उछाल दर्ज किया गया है।
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3. एल्युमिनियम कैन और कार्डबोर्ड (Cans & Cartons)

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युवाओं के बीच बीयर की एल्युमिनियम कैन (Cans) का चलन बहुत तेजी से बढ़ा है। एल्युमिनियम को प्रोसेस करना दुनिया के सबसे ज्यादा ऊर्जा खपत (Energy-intensive) वाले कामों में से एक है।
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    ऊर्जा महंगी होने से एल्युमिनियम के दाम आसमान छू रहे हैं।
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    इसके अलावा, शराब की बोतलों को सुरक्षित ट्रांसपोर्ट करने के लिए इस्तेमाल होने वाले नालीदार गत्ते (Corrugated Cartons/Boxes) की कीमतों में भी लगभग दोगुने (100% वृद्धि) की बढ़ोतरी देखी गई है।
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महंगाई का डेटा: एक त्वरित नज़र

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पैकेजिंग सामग्री
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उपयोगिता
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कीमतों में आया उछाल
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मुख्य कारण
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कांच (Glass)
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शराब की बोतलें
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8% - 12%
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GAIL द्वारा LNG सप्लाई में 40% की कटौती
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पॉलिमर (Plastic)
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बोतल के ढक्कन और सील
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30% - 35%
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कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में तेजी
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गत्ता (Carton)
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बोतलों की सुरक्षित पैकिंग
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लगभग 100% (दोगुने)
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ट्रांसपोर्ट और कच्चे माल की कमी
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एल्युमिनियम (Aluminum)
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बीयर की कैन (Cans)
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भारी वृद्धि
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ग्लोबल ऊर्जा संकट और रिफाइनिंग कॉस्ट
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आपकी जेब पर कितनी पड़ेगी मार? (The 15% Demand)

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कंपनियां साबुन या बिस्किट की तरह अपनी मर्जी से शराब के दाम नहीं बढ़ा सकतीं। भारत में शराब 'राज्य सरकार का विषय' (State Subject) है। हर राज्य का आबकारी विभाग (Excise Department) ही हर ब्रांड की MRP (Maximum Retail Price) तय करता है। इसलिए, शराब उद्योग ने राज्य सरकारों को दाम बढ़ाने का कड़ा अल्टीमेटम भेजा है।
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अलग-अलग सेगमेंट के लिए उद्योग की मांग:-

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इंडियन मेड फॉरेन लिकर (IMFL) की मांग:

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भारत में बनने वाली विदेशी ब्रांड की शराब (जैसे व्हिस्की, रम, वोदका, जिन) के लिए CIABC ने मोर्चा संभाला है। उनकी स्पष्ट मांग है कि:
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    राज्य सरकारें प्रति केस (एक केस में 9 लीटर या 750ml की 12 बोतलें होती हैं) 100 रुपये से लेकर 150 रुपये तक की वृद्धि तुरंत लागू करें।
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    आसान शब्दों में समझें तो, उपभोक्ता को 750ml की एक बोतल पर औसतन 10 से 15 रुपये (ब्रांड की श्रेणी के हिसाब से ज्यादा भी) अतिरिक्त चुकाने पड़ सकते हैं।
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बीयर सेक्टर (Beer Sector) का संघर्ष:

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मार्च का महीना खत्म हो रहा है और गर्मियों का सीजन शुरू होते ही बीयर की डिमांड कई गुना बढ़ जाती है। 'ब्रूअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया' (BAI), जो 'यूनाइटेड ब्रुअरीज' (Heineken/Kingfisher) और 'एब इनबेव' (AB InBev - Budweiser, Corona) जैसी दिग्गज कंपनियों का प्रतिनिधित्व करती है, ने भी गंभीर चिंता व्यक्त की है।
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    BAI ने प्रति केस 25 रुपये से 30 रुपये की बढ़ोतरी की मांग की है।
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    अगर ऐसा होता है, तो आपकी पसंदीदा बीयर की हर बोतल या कैन महंगी हो जाएगी।
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अगर सरकारें नहीं मानीं, तो क्या होगा? (The Economic Domino Effect)

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यह मुद्दा सिर्फ चंद कंपनियों के मुनाफे का नहीं है, बल्कि यह भारत के राजस्व और बाजार के संतुलन से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मसला है। 'ब्रूअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया' (BAI) के महानिदेशक विनोद गिरी ने चेतावनी दी है कि स्थिति 'अलार्मिंग' (Alarming) हो चुकी है।
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1. कंपनियों का अस्तित्व खतरे में (The Survival Crisis)

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कई राज्यों में आबकारी नीतियां इतनी सख्त हैं कि कंपनियां वर्तमान में "नो-प्रॉफिट" या सीधे तौर पर भारी घाटे (Losses) में बीयर और शराब बेच रही हैं। उत्पादन की लागत इतनी ज्यादा हो गई है कि पुरानी MRP पर टिके रहना अब आर्थिक रूप से संभव नहीं है। विनोद गिरी के अनुसार, यदि सरकार ने जल्द ही कीमतों में 'प्राइस रिवीजन' (Price Revision) नहीं किया, तो कई छोटी और मंझोली कंपनियों (Boutique Breweries) का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।
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2. बाजार में शराब की भयंकर किल्लत (Supply Chain Collapse)

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अगर कंपनियां घाटे के डर से अपना उत्पादन (Production) रोक देती हैं या कम कर देती हैं, तो इसका सीधा असर बाजार की सप्लाई चेन पर पड़ेगा।
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    ठेकों (Liquor Shops), क्लबों और बार (Bars) में आपकी पसंदीदा ब्रांड की शराब आउट ऑफ स्टॉक (Out of Stock) हो जाएगी।
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  • \r\n
    अर्थशास्त्र का नियम है कि जब बाजार में डिमांड ज्यादा हो और सप्लाई कम, तो ब्लैक मार्केटिंग (Black Marketing) पनपती है।
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  • \r\n
    सबसे बड़ा खतरा यह है कि सस्ती शराब न मिलने पर लोग 'कच्ची या जहरीली शराब' (Spurious Liquor/Hooch) की तरफ रुख कर सकते हैं, जिससे बड़े मानवीय हादसे (Hooch Tragedies) होने का डर रहता है।
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3. सरकारी खजाने को 5.50 लाख करोड़ का झटका

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शराब उद्योग भारत में राज्य सरकारों के राजस्व का सबसे बड़ा जरिया है। इसे सरकारों के लिए 'सोने का अंडा देने वाली मुर्गी' कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
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    भारत का शराब उद्योग हर साल सरकारी खजाने में लगभग 5.50 लाख करोड़ रुपये का राजस्व (Excise Duty, VAT और लाइसेंस फीस के रूप में) जमा करता है।
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    राज्य सरकारें इसी पैसे से अपने राज्य का इंफ्रास्ट्रक्चर बनाती हैं, सरकारी कर्मचारियों को वेतन देती हैं और अपनी लोकलुभावन योजनाएं (Welfare Schemes) चलाती हैं।
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    यदि शराब की सप्लाई रुकती है, तो सरकारों के राजस्व में भारी सेंध लगेगी, जिससे राज्यों का वित्तीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ सकता है।
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राज्य सरकारों का रुख और आबकारी नीतियां (The State-wise Dynamic)

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भारत में एक राष्ट्र, एक टैक्स (GST) लागू है, लेकिन शराब को GST के दायरे से बाहर रखा गया है। इसका मतलब है कि दिल्ली में शराब की जो कीमत है, वह उत्तर प्रदेश, हरियाणा या कर्नाटक से बिल्कुल अलग होगी।
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वित्तीय वर्ष (Financial Year) के अंत में यानी मार्च-अप्रैल के महीने में सभी राज्य अपनी नई 'आबकारी नीति' (Excise Policy) की घोषणा करते हैं।
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    उत्तर भारत का प्रभाव: दिल्ली, यूपी, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्य आमतौर पर 1 अप्रैल से नए रेट लागू करते हैं। इन राज्यों में शराब की खपत बहुत ज्यादा है, इसलिए उद्योग की नजरें इन पर टिकी हैं।
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  • \r\n
    दक्षिण भारत का दबदबा: कर्नाटक, महाराष्ट्र, और तेलंगाना जैसे राज्य शराब से सबसे ज्यादा राजस्व कमाने वाले राज्यों में शीर्ष पर हैं। यहाँ पहले से ही शराब पर भारी टैक्स है। अगर यहाँ 15% की वृद्धि और होती है, तो प्रीमियम शराब आम आदमी की पहुंच से बाहर हो सकती है।
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आर्थिक जानकारों का मानना है कि राज्य सरकारें उद्योग की इस मांग को पूरी तरह खारिज नहीं कर सकतीं। वे या तो कीमतों में 8-10% की आंशिक वृद्धि की मंजूरी दे सकती हैं, या कंपनियों को टैक्स में कुछ छूट देकर राहत प्रदान कर सकती हैं।
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उपभोक्ताओं पर सीधा असर (How it Changes Consumer Behavior)

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जब भी शराब के दाम बढ़ते हैं, तो उपभोक्ता के व्यवहार (Consumer Psychology) में एक स्पष्ट बदलाव देखने को मिलता है।
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  1. \r\n
    डाउन-ट्रेडिंग (Down-Trading): जब प्रीमियम शराब (Premium Liquor) बहुत महंगी हो जाती है, तो लोग अपने पसंदीदा ब्रांड को छोड़कर उससे एक स्तर नीचे वाले (Regular या Semi-premium) ब्रांड की तरफ शिफ्ट हो जाते हैं।
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  2. \r\n
  3. \r\n
    हॉस्पिटैलिटी सेक्टर पर मार: पब, रेस्टोरेंट और होटल (HORECA Sector) पहले से ही सर्विस चार्ज और अन्य पाबंदियों से जूझ रहे हैं। शराब महंगी होने से डाइन-आउट (Dine-out) करने वाले ग्राहकों का बिल बढ़ जाएगा, जिससे वीकेंड पार्टियों में लोगों की संख्या घट सकती है।
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  4. \r\n
  5. \r\n
    घरेलू खपत (Home Consumption): महंगी शराब के कारण लोग बार या क्लब जाने के बजाय ठेके से बोतल खरीदकर घर पर ही पीना (House Parties) ज्यादा पसंद करेंगे।
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  6. \r\n
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ग्लोबलाइजेशन (Globalization) के इस दौर में दुनिया एक छोटे से गांव की तरह हो गई है। पश्चिम एशिया के रेगिस्तानों में दागी गई एक मिसाइल या ऊर्जा का कोई भी संकट, भारत में आपके वीकेंड के जश्न को महंगा करने की ताकत रखता है। कच्चे माल और पैकेजिंग की लागत का यह 'बम' शराब उद्योग पर फूट चुका है। अब गेंद राज्य सरकारों के पाले में है। उन्हें यह तय करना है कि वे उद्योग को डूबने से बचाएं, सरकारी खजाने को भरें, या उपभोक्ता की जेब का ख्याल रखें। एक बात तय है कि आने वाले दिनों में जब आप ठेके पर जाएंगे, तो आपको अपनी जेब थोड़ी और ढीली करनी पड़ेगी। इसलिए, जब तक पुरानी MRP का स्टॉक मौजूद है... चियर्स! लेकिन जिम्मेदारी से पिएं।
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