नई दिल्ली (ब्यूरो/साइंस डेस्क): खगोल विज्ञान और तारों की दुनिया में दिलचस्पी रखने वालों के लिए आज (रविवार, 14 दिसंबर 2025) की रात बेहद खास होने जा रही है। आज रात आसमान में एक ऐसा नजारा देखने को मिलेगा, जो आपको रोमांचित कर देगा। अंतरिक्ष में कुदरत अपनी आतिशबाजी दिखाने को तैयार है। जी हाँ, आज रात उल्का वृष्टि (Meteor Shower) जिसे आम बोलचाल में 'तारों की बारिश' भी कहा जाता है, अपने चरम पर होगी।READ ALSO:-यूपी में BJP की कमान पंकज चौधरी को: केंद्रीय मंत्री बने नए प्रदेश अध्यक्ष, सीएम योगी की मौजूदगी में हुई ताजपोशी
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यह खगोलीय घटना इतनी शानदार होगी कि इसे देखने के लिए आपको किसी महंगी दूरबीन (Telescope) या बायनोक्यूलर्स की जरूरत नहीं पड़ेगी। आप अपने घर की छत से ही खुली आंखों से इस मनोहारी दृश्य का लुत्फ उठा सकते हैं।
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क्या है यह घटना? विशेषज्ञ की राय

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इस अद्भुत घटना के पीछे के विज्ञान को समझने के लिए वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला, गोरखपुर के खगोलविद् अमर पाल सिंह ने विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष में कई धूमकेतु और क्षुद्रग्रह लंबी कक्षाओं में सूर्य की परिक्रमा करते हैं। इन खगोलीय पिंडों से निकले धूल, गैस और कंकड़-पत्थर अंतरिक्ष में बिखर जाते हैं। जब पृथ्वी अपनी कक्षा में घूमते हुए इन मलबे के ढेर के बीच से गुजरती है, तो ये छोटे-छोटे कण पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण तेजी से वायुमंडल में प्रवेश करते हैं।
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    रफ़्तार और चमक: वायुमंडल में घुसते समय इनकी रफ़्तार 70 किलोमीटर प्रति सेकंड से भी अधिक हो सकती है। इतनी तेज गति के कारण हवा के साथ घर्षण होता है और ये कण जल उठते हैं।
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    ऊंचाई: खगोलविद् के अनुसार, अधिकांश उल्काएं पृथ्वी से 130 से 180 किलोमीटर की ऊंचाई पर ही जलकर राख हो जाती हैं। यही जलते हुए कण हमें धरती से 'टूटते हुए तारे' (Shooting Stars) या आतिशबाजी की लकीरों जैसे दिखाई देते हैं।
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क्यों खास है दिसंबर की 'जेमिनिड्स' उल्का वृष्टि?

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अमर पाल सिंह बताते हैं कि दिसंबर के महीने में होने वाली इस उल्का वृष्टि को 'जेमिनिड्स' (Geminids) कहा जाता है। यह साल की सबसे बेहतरीन उल्का वृष्टियों में से एक मानी जाती है। इसकी सबसे अनोखी बात यह है कि आमतौर पर उल्का वृष्टि किसी धूमकेतु (Comet) के कारण होती है, लेकिन जेमिनिड्स का स्रोत एक क्षुद्रग्रह (Asteroid) है।
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    स्रोत: यह 3200 फेथॉन (3200 Phaethon) नामक क्षुद्रग्रह से निकलती है। दुनिया में बहुत कम ऐसी उल्का वर्षाएं हैं जो धूमकेतु के बजाय क्षुद्रग्रह से पैदा होती हैं। यही कारण है कि यह घटना खगोल वैज्ञानिकों के लिए भी शोध का विषय बनी रहती है।
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कब और किस दिशा में देखें? (Time & Direction)

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अगर आप इस नजारे को मिस नहीं करना चाहते, तो टाइमिंग का विशेष ध्यान रखें:
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    शुरुआत: वैसे तो रात 8 बजे के बाद से ही आसमान में हलचल शुरू हो जाएगी।
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    पीक टाइम (चरम समय): खगोलविद् के अनुसार, असली रोमांच 14 दिसंबर की मध्य रात्रि से लेकर भोर में 4 बजे तक देखने को मिलेगा। इस दौरान उल्काओं की संख्या सबसे ज्यादा होगी।
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    दिशा: ये उल्काएं मिथुन (Gemini) तारामंडल की दिशा से आती हुई प्रतीत होती हैं, जो आसमान में उत्तर-पूर्व (North-East) दिशा में स्थित है। खगोल विज्ञान में इसे 'मीटियर रेडिएंट प्वाइंट' कहा जाता है। हालांकि, ये पूरे आकाश में कहीं भी दिखाई दे सकती हैं, लेकिन उत्तर-पूर्व की ओर इनका घनत्व ज्यादा हो सकता है।
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कितने तारे टूटते दिखेंगे?

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इस साल यह नजारा काफी साफ दिखने की उम्मीद है। गोरखपुर और उत्तर प्रदेश के अन्य इलाकों में अगर आसमान साफ रहा, तो एक घंटे में 40 से 70 उल्काएं तक दिखाई दे सकती हैं। यानी लगभग हर मिनट आप एक टूटते हुए तारे को देख पाएंगे। हालांकि, यह संख्या स्थानीय मौसम और प्रकाश प्रदूषण (Light Pollution) पर भी निर्भर करेगी।
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कैसे देखें यह नजारा?

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इस खगोलीय घटना को देखने के लिए किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं है।
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    अंधेरे वाली जगह चुनें: शहरों की चकाचौंध से दूर किसी ऐसी जगह जाएं जहां अंधेरा हो। ग्रामीण इलाकों (Rural Areas) में यह नजारा सबसे शानदार दिखेगा।
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    धैर्य रखें: अपनी आंखों को अंधेरे में सेट होने के लिए 15-20 मिनट का समय दें।
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    आराम से लेटें: जमीन पर चटाई बिछाकर लेट जाएं और आसमान की ओर देखें। आपको चारों दिशाओं में नजर दौड़ानी चाहिए।
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आज की रात प्रकृति प्रेमियों और स्पेस में रुचि रखने वालों के लिए एक सुनहरा मौका है। सर्दी की रात में आसमान के नीचे जैमिनिड्स उल्का वृष्टि का आनंद लेना एक यादगार अनुभव हो सकता है। बस गर्म कपड़े पहनें, किसी अंधेरी जगह का चुनाव करें और आसमान की ओर निहारें—कुदरत की यह आतिशबाजी आपका इंतजार कर रही है।
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