बिजनौर: उत्तर प्रदेश के वन्यजीव क्षेत्रों से एक बेहद दुखद और चिंताजनक खबर सामने आई है। बिजनौर जिले के संवेदनशील साहूवाला रेंज में हाथी की मौत (Death of elephant in Sahuwala range) ने एक बार फिर वन विभाग की कार्यप्रणाली और पेट्रोलिंग दावों की पोल खोल कर रख दी है। बेनीपुर कोपा जंगल इलाके में एक विशालकाय हाथी का शव बेहद सड़ी-गली और क्षत-विक्षत हालत में बरामद हुआ है। शव की स्थिति देखकर यह साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि हाथी की मौत कई दिन पहले हो चुकी थी, लेकिन जंगल के रक्षक कहे जाने वाले वन विभाग के कर्मचारियों को इसकी भनक तक नहीं लगी।READ ALSO:-बिजनौर की महिलाओं ने भरी आत्मनिर्भरता की उड़ान: 'विदुर' ब्रांड के तहत शुरू किया शुद्ध सरसों तेल और पशु आहार का प्लांट, कमिश्नर ने की जमकर तारीफ
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इस घटना के बाद से वन महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों ने वन विभाग की इस घोर लापरवाही पर कड़ा रोष व्यक्त किया है। आरोप है कि विभाग अपनी गलतियों पर पर्दा डालने और मामले की लीपापोती करने में जुट गया है। इस विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट में हम जानेंगे कि आखिर साहूवाला वन रेंज में ऐसा क्या हुआ, हाथी की मौत के पीछे के संभावित कारण क्या हैं, और क्यों वन विभाग की कार्यशैली लगातार सवालों के घेरे में है।
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बेनीपुर कोपा जंगल में मिला सड़ा-गला शव: गश्त पर उठे सवाल

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साहूवाला वन रेंज क्षेत्र के बेनीपुर कोपा जंगल इलाके में जब स्थानीय लोगों और वन गुर्जरों को तेज दुर्गंध आई, तब जाकर इस घटना का खुलासा हुआ। सूचना मिलने पर जब वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची, तो वहां एक नर हाथी का शव पड़ा था।
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कई दिन पुराना है शव: प्रत्यक्षदर्शियों और प्रारंभिक जांच के अनुसार, हाथी का शव बुरी तरह सड़ चुका है। शरीर के कई हिस्से डिकम्पोज (Decompose) हो चुके हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हाथी की मौत कम से कम 4 से 5 दिन या उससे भी अधिक समय पहले हुई होगी।
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कहां थे वन रक्षक? यह तथ्य वन विभाग के उन दावों की सीधे तौर पर धज्जियां उड़ाता है, जिनमें जंगलों में 24 घंटे सघन गश्त (Patrolling) और ड्रोन कैमरों से निगरानी की बात कही जाती है। अगर बीट वाचर और वन रक्षक अपने तय रूट पर ईमानदारी से गश्त कर रहे होते, तो इतने विशालकाय वन्यजीव का शव इतने दिनों तक लावारिस हालत में नहीं पड़ा रहता। समय रहते यदि बीमार या घायल हाथी पर वन अधिकारियों का ध्यान जाता, तो उचित इलाज (Veterinary Care) देकर शायद इस बेजुबान की जान बचाई जा सकती थी।
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मौत का कारण: करंट या गंभीर बीमारी? (Electrocution vs Disease)

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हाथी की मौत कैसे हुई, यह अभी तक एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है। शव के अत्यधिक सड़ जाने के कारण प्रथम दृष्टया मौत का सटीक कारण (Cause of Death) बता पाना अधिकारियों के लिए भी मुश्किल हो रहा है। वर्तमान में दो प्रमुख आशंकाएं जताई जा रही हैं:
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1. हाईटेंशन लाइन या शिकारियों द्वारा करंट (Electrocution): भारत के कई जंगलों में हाथियों की मौत का सबसे बड़ा कारण करंट लगना होता है। कई बार खेतों की सुरक्षा के नाम पर ग्रामीण तारों में हाई-वोल्टेज करंट दौड़ा देते हैं, या फिर शिकारी (Poachers) हाथी दांत (Ivory) के लालच में जानबूझकर करंट का जाल बिछाते हैं। साहूवाला रेंज के आस-पास भी कृषि क्षेत्र है। क्या हाथी किसी ऐसे ही करंट वाले तार की चपेट में आया?
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2. कोई गंभीर बीमारी या संक्रमण (Fatal Disease): जंगली हाथियों में कई बार एंथ्रेक्स (Anthrax), हर्पीज वायरस (EEHV), या पेट के गंभीर संक्रमण जैसी बीमारियां फैल जाती हैं। बढ़ती उम्र या किसी आपसी संघर्ष में आई अंदरूनी चोट भी मौत का कारण बन सकती है।
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असली कारण का पता पोस्टमार्टम रिपोर्ट (Post-mortem Report) और विसरा (Viscera) की फोरेंसिक जांच के बाद ही चल पाएगा। इसके लिए भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI) या वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के विशेषज्ञों की मदद ली जा सकती है।
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वन विभाग की लीपापोती और उच्चाधिकारियों की जांच

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जैसे ही साहूवाला रेंज में हाथी की मौत की खबर मीडिया और उच्चाधिकारियों तक पहुंची, स्थानीय वन अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। सूत्रों की मानें तो स्थानीय रेंजर और बीट अधिकारी अपनी गर्दन बचाने के लिए इस पूरी घटना को प्राकृतिक मौत साबित करने की जल्दबाजी में हैं और साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ या लीपापोती का प्रयास कर रहे हैं।
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घटनास्थल पर पहुंचे बड़े अफसर: मामले की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग के उच्च अधिकारी (DFO और कंजर्वेटर स्तर के अधिकारी) दल-बल के साथ बेनीपुर कोपा जंगल पहुंच गए हैं। घटनास्थल को सील कर दिया गया है और बारीकी से सबूत जुटाए जा रहे हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि:
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    अगर हाथी की मौत शिकारियों के बिछाए करंट से हुई है, तो यह सुरक्षा में बहुत बड़ी सेंध है।
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    अगर मौत बीमारी से हुई है, तो सर्विलांस सिस्टम की नाकामी उजागर होती है। दोनों ही स्थितियों में लापरवाही बरतने वाले वनकर्मियों (Forest Guards) पर कड़ी विभागीय कार्रवाई (Suspension) की गाज गिरना तय माना जा रहा है।
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साहूवाला रेंज का काला इतिहास: पहले भी जा चुकी है हाथियों की जान

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यह कोई पहला मौका नहीं है जब साहूवाला वन रेंज सुर्ख़ियों में आया है। यह क्षेत्र कॉर्बेट नेशनल पार्क और राजाजी नेशनल पार्क के बीच एक महत्वपूर्ण एलीफेंट कॉरिडोर (Elephant Corridor) का हिस्सा माना जाता है। लेकिन वन विभाग की अनदेखी के चलते यह हाथियों के लिए 'डेथ जोन' बनता जा रहा है।
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पिछली घटनाएं:

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    विगत वर्षों में भी साहूवाला रेंज और इससे सटे इलाकों में हाथियों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है।
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    कभी ट्रेन की चपेट में आने से, कभी किसानों द्वारा बनाए गए गड्ढों में गिरने से, तो कभी संदिग्ध जहर खुरानी से हाथियों ने अपनी जान गंवाई है।
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    हर बार घटना के बाद वन विभाग जांच कमेटी बनाता है, लेकिन कुछ समय बाद फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं। कोई ठोस और दूरगामी कदम नहीं उठाए जाते।
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पर्यावरणविदों का कहना है कि अगर पिछली घटनाओं से सबक लेकर ट्रैकिंग कॉलर (Radio Collars), कैमरा ट्रैप (Camera Traps) और एंटी-पोचिंग कैंप्स (Anti-poaching camps) को सक्रिय किया गया होता, तो आज इस बेजुबान को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ती।
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वन्यजीव संरक्षण: वन विभाग को क्या कदम उठाने चाहिए?

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हाथियों को भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) की अनुसूची-1 के तहत सर्वोच्च सुरक्षा प्राप्त है। एक हाथी की मौत न केवल एक जीव का अंत है, बल्कि पूरे इकोसिस्टम (Ecosystem) के लिए एक बड़ा नुकसान है। भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने नितांत आवश्यक हैं:
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    पैदल गश्त (Foot Patrolling) में सख्ती: बीट गार्ड्स की डिजिटल अटेंडेंस और GPS आधारित पेट्रोलिंग अनिवार्य की जाए, ताकि वे जंगल के अंदरूनी हिस्सों तक जाएं।
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    ड्रोन और थर्मल कैमरों का उपयोग: घने जंगलों में जहां इंसान का पहुंचना मुश्किल हो, वहां ड्रोन से हाथियों के झुंड (Herd) की निगरानी की जाए।
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    रैपिड रेस्पॉन्स टीम (RRT): हर रेंज में एक पशु चिकित्सक (Vet) के साथ RRT मौजूद होनी चाहिए, जो किसी भी जानवर के बीमार या घायल होने की सूचना मिलते ही तुरंत मौके पर पहुंचे।
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    खुफिया तंत्र (Informer Network): शिकारियों और लकड़ी तस्करों पर नकेल कसने के लिए स्थानीय ग्रामीणों और वन गुर्जरों को मुखबिर के तौर पर जोड़ा जाए।
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बिजनौर के साहूवाला रेंज में हाथी की मौत ने राज्य के वन्यजीव संरक्षण दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। बेनीपुर कोपा जंगल में कई दिनों से सड़ रहा हाथी का शव इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वन विभाग की पेट्रोलिंग केवल कागजों तक ही सीमित है। यह मौत करंट लगने से हुई है या बीमारी से, इसका खुलासा तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट से होगा, लेकिन विभाग द्वारा अपनी कमियों पर पर्दा डालने की कोशिशें दुर्भाग्यपूर्ण हैं। चूंकि साहूवाला रेंज में हाथियों की मौत का यह पहला मामला नहीं है, इसलिए अब समय आ गया है कि उच्चाधिकारी इस मामले की निष्पक्ष जांच करें और लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई करें, ताकि भविष्य में हमारे राष्ट्रीय विरासत पशु (National Heritage Animal) को इस तरह लावारिस मौत न मरना पड़े।
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