मेरठ (स्पेशल रिपोर्ट): भारतीय सिनेमा में देशभक्ति का ज्वार उठाने वाली फिल्मों की जब भी बात होती है, तो जेपी दत्ता की 'बार्डर' का नाम सबसे ऊपर आता है। दशकों बाद जब इस फिल्म का सीक्वल 'बार्डर-2' (Border 2) रिलीज हुआ, तो दर्शकों को उम्मीद थी कि यह फिल्म भी उसी गौरवशाली इतिहास को दोहराएगी। लेकिन, मेरठ में फिल्म की रिलीज के साथ ही स्क्रीन पर दिखाई गई देशभक्ति की जगह एक विवाद ने ले ली है। यह विवाद इतना गहरा गया है कि मामला पुलिस थाने की चौखट तक जा पहुंचा है।Read also:-बिजनौर में मौत बनकर फटा सिलेंडर: शेरकोट में मलबे के ढेर में तब्दील हुआ घर, धमाके की गूंज से सहमा इलाका, एक बुजुर्ग की दर्दनाक मौत
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फिल्म में इस्तेमाल किए गए एक संवाद और दृश्य ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलित समाज को उद्वेलित कर दिया है। आरोप है कि फिल्म निर्माताओं ने मनोरंजन की आड़ में एक विशेष समुदाय की भावनाओं को कुचलने का प्रयास किया है।
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फ्लैशबैक: क्या है पूरा मामला?

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रविवार का दिन मेरठ के परतापुर इलाके के लिए गहमागहमी भरा रहा। बहुजन जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अतुल खोड़ावाल अपने समर्थकों के साथ परतापुर थाने पहुंचे। उनके हाथों में संगठन का लेटर पैड था और चेहरे पर भारी आक्रोश। मामला हाल ही में रिलीज हुई फिल्म 'बार्डर-2' से जुड़ा था।
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विवादित दृश्य का 'पोस्टमार्टम'

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अतुल खोड़ावाल और उनकी लीगल टीम द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, फिल्म की कुल अवधि 3 घंटा 19 मिनट है। फिल्म अपनी रफ्तार से चल रही होती है, लेकिन ठीक 27 मिनट 37 सेकेंड पर एक ऐसा दृश्य आता है, जिसने इस पूरे बखेड़े को जन्म दिया।
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    दृश्य की पृष्ठभूमि: यह सीन एक सैन्य शिविर का है। सैनिक खाली समय में अपने काम कर रहे हैं।
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    पात्रों की भूमिका: एक कलाकार, जो सैनिक का किरदार निभा रहा है, बैठकर अपने जूते पॉलिश कर रहा है। यह एक सामान्य दिनचर्या का हिस्सा लगता है।
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    संवाद और आपत्ति: तभी दूसरा सैनिक वहां पहुंचता है और जूते पॉलिश कर रहे जवान से बात करना शुरू करता है। बातचीत हंसी-मजाक के लहजे में शुरू होती है। पॉलिश कर रहा सैनिक जवाब भी देता है, लेकिन इसी दौरान दूसरा सैनिक उसे संबोधित करने के लिए अनुसूचित जाति से जुड़े एक बेहद आपत्तिजनक शब्द (गाली/स्लर) का प्रयोग करता है।
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शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह शब्द अनायास नहीं निकला है, बल्कि इसे स्क्रिप्ट का हिस्सा बनाया गया है, जो सीधे तौर पर जातिगत भेदभाव और एक समाज विशेष को नीचा दिखाने की मानसिकता को दर्शाता है।
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शिकायतकर्ता का पक्ष: "कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं निर्माता"

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परतापुर थाने में मीडिया से बात करते हुए बहुजन जनता दल के अध्यक्ष अतुल खोड़ावाल ने फिल्म के निर्माता और निर्देशक पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि बॉलीवुड के निर्माता अक्सर 'रचनात्मक स्वतंत्रता' (Creative Liberty) की आड़ में दलित और पिछड़े समाज का अपमान करते आए हैं, लेकिन अब समाज जागरूक हो चुका है और इस तरह के कृत्यों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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"जूता पॉलिश करते हुए सैनिक को दिखाना और फिर उसे जातिसूचक शब्द से संबोधित करना, यह संयोग नहीं प्रयोग है। यह दर्शाता है कि फिल्म बनाने वालों के दिमाग में जातिवाद का कीड़ा कितना गहरा बैठा है। क्या सेना जैसे पवित्र संस्थान में, जहां सिर्फ 'भारतीय' होते हैं, वहां ऐसी जातिगत गंदगी दिखाना सेना का अपमान नहीं है?" - अतुल खोड़ावाल, राष्ट्रीय अध्यक्ष, बहुजन जनता दल
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खोड़ावाल ने आगे कहा कि देश में एससी-एसटी एक्ट (SC/ST Act) और नए भारतीय न्याय संहिता (BNS) के कड़े प्रावधान होने के बावजूद, निर्माता-निर्देशकों ने कानून को ठेंगा दिखाने का काम किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि सेंसर बोर्ड की कैंची इस शब्द पर क्यों नहीं चली? क्या यह जानबूझकर विवाद पैदा करने के लिए रखा गया था?
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कानूनी पेंच: BNS और SC/ST एक्ट की धाराओं का चक्रव्यूह

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अतुल खोड़ावाल ने अपनी लिखित तहरीर में सिर्फ माफी की मांग नहीं की है, बल्कि इसे एक गंभीर आपराधिक कृत्य मानते हुए भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita - BNS) और SC/ST एक्ट की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।
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आइये समझते हैं कि शिकायत में जिन धाराओं का जिक्र किया गया है, वे कितनी गंभीर हैं और यदि पुलिस इन पर एफआईआर (FIR) दर्ज करती है, तो फिल्म के निर्देशक अनुराग सिंह और निर्माता भूषण कुमार के लिए कितनी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
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1. BNS धारा 196 (पुराने IPC की धारा 153A के समतुल्य)

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यह धारा धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने और सद्भाव बनाए रखने के प्रतिकूल कार्य करने से संबंधित है।
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    आरोप: फिल्म में जातिसूचक शब्द का प्रयोग समाज में वैमनस्यता फैला सकता है।
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    प्रावधान: इसमें 3 साल तक की कैद और जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।
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2. BNS धारा 192 (दंगा भड़काने के इरादे से उकसाना)

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यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर कोई ऐसा कार्य करता है जिससे दंगा भड़कने की आशंका हो।
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    आरोप: दलित समाज की भावनाओं को आहत करके उन्हें उग्र प्रतिक्रिया देने के लिए उकसाना।
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3. BNS धारा 299 (धार्मिक/जातिगत भावनाओं को ठेस पहुँचाना)

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यह धारा किसी भी वर्ग की धार्मिक या सामाजिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से अपमानित करने से संबंधित है।
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    आरोप: फिल्म का दृश्य सीधे तौर पर दलित अस्मिता पर प्रहार है।
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4. BNS धारा 353 (2) (गलत जानकारी या अफवाह फैलाना)

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यह धारा उन बयानों या दृश्यों पर लागू होती है जो विभिन्न समुदायों के बीच नफरत या घृणा पैदा करते हैं।
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5. SC/ST एक्ट (अत्याचार निवारण अधिनियम)

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यह सबसे गंभीर पहलू है। यदि किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति को (भले ही वह फिल्म का पात्र हो, लेकिन वह प्रतिनिधित्व पूरे समाज का कर रहा है) जाति के आधार पर अपमानित किया जाता है, तो यह गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आ सकता है।
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नामजद आरोपी: बॉलीवुड के दिग्गजों पर लटकी तलवार

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शिकायत में किसी अज्ञात व्यक्ति को नहीं, बल्कि फिल्म निर्माण से जुड़े शीर्ष नामों को आरोपी बनाने की मांग की गई है। तहरीर में निम्नलिखित नाम शामिल हैं:
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  1. \r\n
    अनुराग सिंह (निर्देशक): फिल्म के कैप्टन के रूप में, स्क्रीन पर जो भी दिखाया जाता है, उसकी अंतिम जिम्मेदारी निर्देशक की मानी जाती है।
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  2. \r\n
  3. \r\n
    भूषण कुमार (टी-सीरीज - निर्माता): फिल्म के फाइनेंसर और प्रोड्यूसर होने के नाते वे भी इस कानूनी दायरे में आते हैं।
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  4. \r\n
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    जेपी दत्ता (निर्माता/प्रेजेंटर): 'बार्डर' फ्रैंचाइज़ी के जनक।
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    निधि दत्ता (निर्माता): फिल्म निर्माण टीम का हिस्सा।
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    संबंधित कलाकार: वह अभिनेता जिसने स्क्रीन पर उस आपत्तिजनक शब्द का उच्चारण किया।
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मेरठ का सामाजिक समीकरण और फिल्म का विरोध

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मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश दलित राजनीति और सामाजिक चेतना का केंद्र रहा है। यहाँ से उठने वाली आवाज अक्सर दिल्ली और मुंबई तक असर करती है। 'बार्डर-2' जैसी बड़ी बजट की फिल्म के खिलाफ यहाँ विरोध शुरू होना फिल्म के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के लिए खतरे की घंटी हो सकता है।
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सेंसर बोर्ड (CBFC) पर भी उठे सवाल

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इस विवाद ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
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    एक तरफ सेंसर बोर्ड फिल्मों में छोटी-छोटी गालियों पर 'बीप' लगा देता है।
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    दूसरी तरफ, 3 घंटे 19 मिनट की फिल्म में एक जातिसूचक शब्द (Caste Slur) कैसे पास हो गया?
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    क्या स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्यों ने इस शब्द को नजरअंदाज किया, या उन्हें इसका सामाजिक प्रभाव समझ नहीं आया?
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अतुल खोड़ावाल का कहना है कि यह "सिर्फ एक शब्द" नहीं है, यह सदियों के दंश को कुरेदने जैसा है। उन्होंने मांग की है कि जब तक यह सीन फिल्म से नहीं हटाया जाता और दोषियों पर कार्रवाई नहीं होती, उनका संगठन चुप नहीं बैठेगा।
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क्या होगा अगला कदम?

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परतापुर थाने में दी गई तहरीर के बाद अब पुलिस की भूमिका अहम हो गई है। प्रक्रिया के अनुसार:
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  1. \r\n
    जांच (Preliminary Inquiry): पुलिस सबसे पहले फिल्म के उस क्लिप की जांच करेगी।
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    कानूनी राय: पुलिस अभियोजन अधिकारियों से राय ले सकती है कि क्या फिल्मी दृश्य पर SC/ST एक्ट सीधे लागू होता है।
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  5. \r\n
    FIR दर्ज करना: यदि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) आरोप सही पाए जाते हैं, तो पुलिस को FIR दर्ज करनी होगी।
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मांगें स्पष्ट हैं:

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    तत्काल प्रभाव से मुकदमा दर्ज हो।
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  • \r\n
    फिल्म से 27:37 मिनट वाला दृश्य काटा जाए।
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  • \r\n
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    निर्माता सार्वजनिक रूप से माफी मांगें।
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सिनेमा और जातिवाद: एक पुराना संघर्ष

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बॉलीवुड का दलित प्रतिनिधित्व के साथ रिश्ता हमेशा से खट्टा-मीठा रहा है। पहले फिल्मों में दलित पात्रों को अक्सर पीड़ित या लाचार दिखाया जाता था। हालाँकि, 'आर्टिकल 15', 'जय भीम' और 'मसान' जैसी फिल्मों ने इस नैरेटिव को बदला है। लेकिन 'बार्डर-2' जैसी मसाला और मेनस्ट्रीम फिल्म में इस तरह की चूक (या जानबूझकर किया गया कृत्य) यह साबित करती है कि संवेदनशीलता के मामले में अभी भी बॉलीवुड को लंबा सफर तय करना है।
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अतुल खोड़ावाल के शब्दों में, "सैनिक सिर्फ सैनिक होता है, उसकी कोई जाति नहीं होती। उसे जाति के चश्मे से दिखाना देश की सुरक्षा में लगे जवानों का मनोबल तोड़ने जैसा है।"
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निष्कर्ष: विवाद सुलझेगा या और भड़केगा?
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'बार्डर-2' अभी सिनेमाघरों में नई है। मेरठ से उठी यह चिंगारी अगर अन्य राज्यों तक फैलती है, तो फिल्म के निर्माताओं के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है। फिलहाल, परतापुर पुलिस की कार्रवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं। क्या पुलिस बॉलीवुड के बड़े नामों के खिलाफ FIR दर्ज करने का साहस दिखाएगी? या फिर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
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यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म निर्माण कंपनी 'टी-सीरीज' और निर्देशक अनुराग सिंह इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। क्या वे दृश्य हटाकर विवाद खत्म करेंगे, या फिर यह मामला कोर्ट की दहलीज तक जाएगा?
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प्रमुख बिंदु (Key Highlights for Quick Reading)

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    विवाद का केंद्र: फिल्म 'बार्डर-2' (Border 2)।
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    अवधि: 3 घंटे 19 मिनट।
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    आपत्तिजनक दृश्य का समय: 27 मिनट 37 सेकेंड।
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    स्थान: परतापुर थाना, मेरठ।
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    शिकायतकर्ता: अतुल खोड़ावाल (राष्ट्रीय अध्यक्ष, बहुजन जनता दल)।
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    आरोपी: भूषण कुमार, अनुराग सिंह, जेपी दत्ता, निधि दत्ता और कलाकार।
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    मुख्य धाराएं: BNS 196, 192, 299, 353(2) और SC/ST एक्ट।
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    दृश्य का विवरण: एक सैनिक जूता पॉलिश कर रहा है, दूसरा उसे जातिसूचक शब्द बोलता है।
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    मांग: FIR दर्ज हो और सीन फिल्म से हटाया जाए।
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