उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था का 'राम भरोसे' हाल एक बार फिर शर्मनाक तरीके से उजागर हुआ है। बिजनौर जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल—महात्मा विदुर मेडिकल कॉलेज—इन दिनों एक ऐसे कारनामे के लिए सुर्खियों में है, जिसे सुनकर आप अपनी हंसी रोकेंगे या सिस्टम पर रोएंगे, यह तय करना मुश्किल है। यहां रील लाइफ की फिल्म 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' रीयल लाइफ में चल रही थी, लेकिन इसका अंजाम कॉमेडी नहीं, बल्कि ट्रेजेडी (त्रासदी) हो सकता था।READ ALSO:-पर्दे पर उतरेगा मेरठ का 'पाताल लोक': पति की लाश, नीला ड्रम और सीमेंट का घोल; ZEE5 की सीरीज 'हनीमून से हत्या' में देखिए मुस्कान-साहिल की खौफनाक साजिश
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फर्क सिर्फ इतना था कि फिल्म में हीरो लोगों का इलाज 'जादू की झप्पी' से कर रहा था, लेकिन यहां एक 12वीं पास लड़का टीबी (क्षय रोग) और छाती के गंभीर मरीजों को हाई-पावर एलोपैथिक दवाइयां लिख रहा था। वह भी सरकारी डॉक्टर की कुर्सी पर बैठकर, उनकी ही मोहर (Stamp) लगाकर और उनके ही लेटरपैड पर।
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इस खौफनाक लापरवाही का खुलासा तब हुआ, जब एक सतर्क फार्मासिस्ट को दवाइयों के पर्चे देखकर शक हुआ। जब चेहरे से मास्क हटा, तो पता चला कि जिसे सैकड़ों मरीज अपना 'मसीहा' और 'भगवान' समझकर अपनी नब्ज दिखा रहे थे, उसके पास न तो एमबीबीएस की डिग्री थी, न ही कोई मेडिकल अनुभव, और न ही मरीजों की जान की कोई परवाह।
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डॉक्टर साहब नदारद, कुर्सी पर 'डमी' तैनात

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घटना बिजनौर डिस्ट्रिक्ट मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल की ओपीडी (OPD) की है। यह समय सुबह का था जब मरीजों की सबसे ज्यादा भीड़ होती है। अस्पताल में टीबी (Tuberculosis) और चेस्ट (Chest) विभाग के विशेषज्ञ डॉक्टर तुषार की ड्यूटी लगी थी। टीबी एक संक्रामक और गंभीर बीमारी है, जिसके इलाज के लिए बेहद सधे हुए हाथों और अनुभवी दिमाग की जरूरत होती है।
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मरीजों की लंबी कतार लगी थी। गांव-देहात से आए गरीब, खांसते हुए बुजुर्ग और महिलाएं अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। एक-एक करके मरीज डॉक्टर के चैंबर में जा रहे थे। चैंबर के अंदर डॉक्टर की रिवॉल्विंग चेयर पर एक शख्स बैठा था। उसने चेहरे पर सर्जिकल मास्क लगा रखा था। वह बड़े ही आत्मविश्वास (Confidence) के साथ मरीजों की नब्ज टटोल रहा था, स्टेथोस्कोप का नाटक कर रहा था और धड़ाधड़ दवाइयां लिख रहा था।
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वह डॉक्टर तुषार की कुर्सी पर बैठा था, डॉक्टर तुषार के सरकारी लेटरपैड का इस्तेमाल कर रहा था और पर्चे पर मुहर भी 'डॉक्टर तुषार' की ही लगा रहा था। दूर-दराज के गांवों से आए अनपढ़ और गरीब मरीज उसे ही असली डॉक्टर मानकर अपनी जिंदगी उसके हाथ में सौंप रहे थे। उन्हें क्या पता था कि जिस कुर्सी पर विश्वास बैठा होना चाहिए, वहां धोखा बैठा है।
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फार्मासिस्ट का शक और भंडाफोड़ (The Turning Point)

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इस पूरे 'फर्जीवाड़े' के नाटक का पटाक्षेप शायद कभी नहीं होता, अगर अस्पताल की फार्मेसी (दवा काउंटर) पर तैनात फार्मासिस्ट राजेश रवि ने सतर्कता न दिखाई होती।
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जब मरीज डॉक्टर के केबिन से पर्चा लेकर दवा काउंटर पर पहुंचे, तो फार्मासिस्ट राजेश रवि ने पर्चों पर गौर किया। उन्हें कुछ अजीब लगा:
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    खतरनाक रिपीटीशन: राजेश ने नोटिस किया कि जो पुराने मरीज पिछले 2-3 महीने से इलाज करा रहे हैं, उन्हें भी बार-बार वही दवाइयां 'रिपीट' में लिखी जा रही हैं। टीबी के इलाज में मरीज की रिकवरी, वजन और टेस्ट रिपोर्ट्स के आधार पर दवाओं की डोज बदलनी पड़ती है। लेकिन यह 'डॉक्टर' लकीर का फकीर बना हुआ था।
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    हस्तलिपि (Handwriting) का मिलान: फार्मासिस्ट राजेश रवि लंबे समय से वहां कार्यरत हैं और डॉक्टर तुषार की लिखावट पहचानते थे। पर्चे पर लिखी राइटिंग, हस्ताक्षर और दवा लिखने का पैटर्न (Pattern) डॉक्टर तुषार जैसा बिल्कुल नहीं था।
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शक गहराने पर फार्मासिस्ट राजेश रवि ने इसे नजरअंदाज करने के बजाय मामले की तह तक जाने का फैसला किया। उन्होंने तुरंत अस्पताल के सीनियर डॉक्टर राजीव रस्तोगी को सूचित किया और अपनी शंका जाहिर की। इसके बाद राजेश रवि और डॉ. राजीव रस्तोगी सीधे डॉ. तुषार के चैंबर की तरफ बढ़े।
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नकाब उतरा तो उड़ गए सबके होश

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जैसे ही डॉ. राजीव रस्तोगी और फार्मासिस्ट चैंबर का दरवाजा खोलकर अंदर घुसे, वहां का नजारा देखकर वे सन्न रह गए।
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    असली डॉक्टर तुषार चैंबर से गायब थे।
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    उनकी जगह एक अनजान युवक मास्क लगाए कुर्सी पर जमा हुआ था।
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    उसके सामने मरीज बैठा था और वह कलम चला रहा था।
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जब डॉ. रस्तोगी ने कड़क आवाज में पूछा, "तुम कौन हो? डॉक्टर तुषार कहां हैं? और तुम उनकी कुर्सी पर क्या कर रहे हो?" तो पहले वह शख्स सकपका गया। उसने बहाने बनाने की कोशिश की, कभी फाइलें पलटने लगा तो कभी फोन देखने लगा। लेकिन जब डॉक्टर रस्तोगी ने पुलिस बुलाने और सिक्योरिटी गार्ड्स को आवाज लगाने की धमकी दी, तो वह टूट गया।
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उसने अपना नाम दिनेश बताया। उसके मुंह से निकले सच ने वहां मौजूद स्टाफ और मरीजों के पैरों तले जमीन खिसका दी। दिनेश ने कबूला:
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"साहब, मैं कोई डॉक्टर नहीं हूं। मुझे तो डॉक्टर तुषार साहब ने अपनी जगह काम पर रखा है। मैं काफी समय से यहां उनकी जगह आता हूं, मरीजों को देखता हूं और दवाइयां लिखता हूं। उन्होंने ही मुझे यह काम सौंपा है।"
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योग्यता: '12वीं पास' मुन्ना भाई

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जांच में सबसे चौंकाने वाला और डरावना पहलू उसकी योग्यता (Qualification) को लेकर सामने आया। जब उससे पूछा गया कि तुमने मेडिकल की कौन सी पढ़ाई की है? क्या तुम फार्मासिस्ट हो या कंपाउंडर? तो उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया— "साहब, मैं तो बस 12वीं पास हूं।"
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जरा सोचिए, टीबी जैसी जानलेवा बीमारी, जिसके लिए एक डॉक्टर को 5 साल एमबीबीएस और फिर एमडी (MD) की पढ़ाई करनी पड़ती है, उसका इलाज एक स्कूली शिक्षा प्राप्त लड़का कर रहा था। यह सीधे तौर पर हत्या की कोशिश जैसा मामला है। पूछताछ के दौरान जैसे ही वहां भीड़ बढ़ी और मरीजों को हकीकत पता चली, माहौल गर्म हो गया। इसी अफरातफरी का फायदा उठाकर फर्जी डॉक्टर दिनेश वहां से भाग निकला।
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असली डॉक्टर का यू-टर्न: 'असिस्टेंट' से 'अंजान' तक का सफर

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इस घटना का सबसे शर्मनाक पहलू असली डॉक्टर, डॉ. तुषार का रवैया रहा। जब सीनियर डॉक्टर राजीव रस्तोगी ने फोन पर डॉ. तुषार से संपर्क किया और पूछा कि उनके चैंबर में यह बाहरी व्यक्ति क्या कर रहा था, तो डॉ. तुषार के जवाब गिरगिट की तरह रंग बदलने लगे:
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    पहला झूठ (The Cover-up): शुरुआत में डॉ. तुषार ने कहा कि दिनेश उनका 'प्राइवेट असिस्टेंट' है और काम के बोझ के कारण वह उनकी मदद कर रहा है।
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    दूसरा झूठ (The Denial): जब उन्हें बताया गया कि असिस्टेंट मदद करता है, डॉक्टर की कुर्सी पर बैठकर दवा नहीं लिखता, और मामला तूल पकड़ने लगा, तो डॉ. तुषार अपनी बात से पलट गए। उन्होंने दिनेश को पहचानने से ही इनकार कर दिया।
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गंभीर सवाल:

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    अगर डॉ. तुषार उसे नहीं जानते, तो वह व्यक्ति सरकारी अस्पताल के सुरक्षित ओपीडी चैंबर में, डॉक्टर की निजी कुर्सी पर, उनकी मुहर (Stamp) और लेटरपैड के साथ घंटों तक कैसे बैठा रहा?
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  • \r\n
    क्या बिना डॉक्टर की मर्जी के कोई बाहरी व्यक्ति उनकी मुहर इस्तेमाल कर सकता है?
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    यह साफ तौर पर मिलीभगत और सरकारी ड्यूटी से नदारद रहकर प्राइवेट प्रैक्टिस या आराम करने की साजिश की ओर इशारा करता है।
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प्रशासनिक हड़कंप और डीएम की सर्जिकल स्ट्राइक

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मामला मीडिया और सोशल मीडिया में आने के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया। बिजनौर की जिलाधिकारी (DM) जसजीत कौर ने इसे बेहद गंभीरता से लिया है। उन्होंने इसे मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़, सरकारी धन का दुरुपयोग और घोर लापरवाही माना है।
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डीएम जसजीत कौर का सख्त बयान:

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"यह एक अत्यंत गंभीर और अक्षम्य प्रकरण है। सरकारी अस्पताल में अनाधिकृत व्यक्ति द्वारा मरीजों का इलाज किया जाना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। मैंने एडीएम (ADM - प्रशासन) और सीएमओ (CMO) बिजनौर की अध्यक्षता में एक संयुक्त जांच कमेटी गठित कर दी है। जांच रिपोर्ट आते ही मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल, आरोपी डॉक्टर तुषार और अस्पताल के सीएमएस (CMS) की जवाबदेही तय की जाएगी। दोषी पाए जाने पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए शासन को पत्र लिखा जाएगा। किसी को बख्शा नहीं जाएगा।"
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टीबी के इलाज में 'फर्जीवाड़े' का खतरा क्यों बड़ा है?

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एक 12वीं पास लड़के द्वारा टीबी मरीजों का इलाज करना सामान्य झोलाछाप डॉक्टरी से कहीं ज्यादा खतरनाक क्यों है? मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार इसके घातक परिणाम हो सकते हैं:
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    MDR-TB का खतरा (The Superbug Threat): टीबी की दवाइयां (एंटीबायोटिक्स) बहुत सटीक डोज और समय पर लेनी होती हैं। अगर गलत दवा दी गई, कम डोज दी गई या बेवजह दवा बदल दी गई, तो टीबी का बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी (Resistant) हो जाता है। इसे 'मल्टी-ड्रग रेसिस्टेंट टीबी' (MDR-TB) कहते हैं, जिसका इलाज बेहद मुश्किल, महंगा और जानलेवा होता है। दिनेश की अज्ञानता ने न जाने कितने मरीजों को MDR-TB के खतरे में डाल दिया होगा।
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  3. \r\n
    संक्रमण का फैलाव (Community Spread): अगर मरीज का सही डायग्नोसिस नहीं हुआ और उसे सही दवा नहीं मिली, तो वह ठीक होने के बजाय अपने परिवार और समाज में टीबी फैलाता रहेगा। एक अनुपचारित टीबी मरीज साल भर में 10-15 लोगों को संक्रमित कर सकता है।
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  5. \r\n
    लिवर और किडनी पर असर: टीबी की दवाओं के गंभीर साइड इफेक्ट्स होते हैं जो लिवर पर असर डालते हैं। एक डॉक्टर समय-समय पर LFT (लिवर फंक्शन टेस्ट) करवाता है। एक 12वीं पास व्यक्ति को यह पता ही नहीं होगा कि रिएक्शन होने पर क्या करना है।
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बदनाम रहा है बिजनौर मेडिकल कॉलेज: अव्यवस्थाओं का गढ़

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यह पहली बार नहीं है जब बिजनौर का महात्मा विदुर मेडिकल कॉलेज विवादों में आया हो। स्थानीय लोगों और तीमारदारों का कहना है कि यहां अव्यवस्थाओं का अंबार है। यह अस्पताल इलाज कम और रेफर सेंटर ज्यादा बनकर रह गया है।
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    महिला आयोग की नाराजगी: अभी कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्षा बबीता चौहान ने अस्पताल का औचक निरीक्षण किया था। गंदगी, डॉक्टरों की अनुपस्थिति और अव्यवस्था देखकर वह इतनी नाराज हुई थीं कि उन्होंने अपनी आधिकारिक निरीक्षण टिप्पणी (Inspection Note) में साफ लिखा था कि— "मरीजों के इलाज से पहले इस अस्पताल को खुद इलाज की जरूरत है।"
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    लापरवाही का इतिहास: कभी ऑक्सीजन की कमी, कभी दवाओं का न होना, तो कभी डॉक्टरों का नदारद रहना—यहां आम बात हो गई है। लेकिन अपनी जगह 'भाड़े के टट्टू' को बैठाकर इलाज कराने का यह मामला लापरवाही की सारी हदें पार कर गया है।
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कानूनी पेंच: डॉक्टर और 'मुन्ना भाई' पर क्या कार्रवाई हो सकती है?

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कानून के जानकारों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं के मुताबिक, इस मामले में आरोपी डॉक्टर तुषार और फर्जी डॉक्टर दिनेश दोनों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और अन्य कानूनों के तहत गंभीर धाराएं लग सकती हैं:
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  1. \r\n
    IPC/BNS की धाराएं: धोखाधड़ी (420), प्रतिरूपण यानी किसी और का रूप धरना (416/419), और दूसरों की जान या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालना (336)।
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  3. \r\n
    इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट (NMC Act): इसके तहत बिना डिग्री के इलाज करना (Quackery) एक दंडनीय अपराध है। साथ ही, एक पंजीकृत डॉक्टर द्वारा अपनी जगह किसी अयोग्य व्यक्ति को बैठाना 'अनैतिक आचरण' (Unethical Conduct) है, जिसके लिए डॉ. तुषार का मेडिकल लाइसेंस निलंबित या रद्द किया जा सकता है।
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  4. \r\n
  5. \r\n
    भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम: क्योंकि डॉक्टर तुषार ने सरकारी ड्यूटी पर न होते हुए भी वेतन लिया और अपनी सरकारी जिम्मेदारी एक अनाधिकृत व्यक्ति को आउटसोर्स कर दी, यह भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।
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सिस्टम का 'पोस्टमार्टम' जरूरी

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बिजनौर की यह घटना सिर्फ एक डॉक्टर की व्यक्तिगत लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे मॉनिटरिंग सिस्टम की विफलता है। यह घटना कई चुभते हुए सवाल छोड़ जाती है:
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    अस्पताल का प्रशासन और सीएमएस (CMS) क्या कर रहा था? क्या उन्हें ओपीडी में राउंड लेने की फुर्सत नहीं थी?
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    सीसीटीवी कैमरे क्या कर रहे थे?
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    सिक्योरिटी गार्ड्स ने एक बाहरी व्यक्ति को डॉक्टर की कुर्सी पर बैठने कैसे दिया? क्या वे भी मिले हुए थे?
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फार्मासिस्ट राजेश रवि की सतर्कता और साहस ने आज कई मरीजों की जान बचा ली, लेकिन सवाल यह है कि यह खेल कब से चल रहा था? कितने मरीजों को गलत दवाइयां दी गईं? क्या प्रशासन उन मरीजों को ट्रेस करके उनकी दोबारा जांच कराएगा ताकि उनकी जान बच सके?
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अब देखना यह है कि डीएम द्वारा गठित जांच कमेटी कितनी जल्दी अपनी रिपोर्ट सौंपती है और क्या वाकई में आरोपी 'बाबू' और 'डॉक्टर' पर कोई ठोस कार्रवाई होती है, या फिर फाइलों में दबकर यह मामला भी ठंडा हो जाएगा, जैसा अक्सर सरकारी सिस्टम में होता है। उत्तर प्रदेश सरकार को इस मामले को एक नजीर (Example) बनाना चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी डॉक्टर मरीजों की जिंदगी को 'आउटसोर्स' करने की हिम्मत न कर सके।
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पाठकों से अपील: सरकारी अस्पतालों में इलाज कराते समय सतर्क रहें। डॉक्टर की नेमप्लेट और व्यवहार पर ध्यान दें। अगर कोई संदेह हो, तो तुरंत सीएमएस या शिकायत पटल पर संपर्क करें। आपकी जागरूकता किसी की जान बचा सकती है।
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