पटना: बिहार की राजनीतिक बिसात पर 2025 के विधानसभा चुनाव की गोटियां बिछाई जाने लगी हैं। यह चुनाव सिर्फ दो गठबंधनों की लड़ाई नहीं, बल्कि दो बिल्कुल अलग राजनीतिक नैरेटिव का महासंग्राम होने वाला है। एक तरफ हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो अपने 17 साल के 'सुशासन' और 'विकास' के मॉडल को लेकर जनता के बीच हैं, तो दूसरी तरफ हैं तेजस्वी यादव, जो 'रोजगार' और 'सामाजिक न्याय' के दोधारी हथियार से सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।READ ALSO:-24 मासूमों की जान लेने वाला 'मौत का सिरप'; कंपनी का डायरेक्टर गिरफ्तार, जांच में खुलासा- दवा में था 486 गुना ज़्यादा ज़हर!
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खेमा नंबर 1: नीतीश कुमार का 'विकास' और 'सुशासन' का किला
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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का पूरा चुनाव अभियान उनके 'सात निश्चय पार्ट-2' के इर्द-गिर्द केंद्रित है। यह उनके 'विकास मॉडल' का वो संस्करण है, जिसके दम पर वे बिहार की जनता को एक बेहतर भविष्य का सपना दिखा रहे हैं।
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    क्या है 'सात निश्चय-2' में खास?
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      युवा शक्ति: स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड, कौशल विकास और प्रशिक्षण पर जोर।
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      सशक्त महिला: उद्यमिता के लिए महिलाओं को 5 लाख तक का अनुदान और ब्याज मुक्त कर्ज।
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      हर खेत तक पानी: सिंचाई की व्यवस्था को दुरुस्त करने का बड़ा वादा।
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      स्वच्छ गांव-शहर: हर गांव में सोलर लाइट और शहरों में बेहतर ड्रेनेज सिस्टम।
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      बेहतर स्वास्थ्य: सबके लिए अतिरिक्त स्वास्थ्य सुविधा।
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रणनीति: नीतीश कुमार अपनी 'सुशासन बाबू' की छवि और खासकर महिला वोटरों के बीच अपनी मजबूत पकड़ पर भरोसा कर रहे हैं। कल्याणकारी योजनाओं के जरिए वे सत्ता विरोधी लहर को कम करने की कोशिश में हैं। उनका नैरेटिव स्पष्ट है - हमने बिहार को 'जंगलराज' से निकालकर विकास की पटरी पर दौड़ाया है।
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खेमा नंबर 2: तेजस्वी यादव का 'रोजगार' और 'सामाजिक न्याय' का चक्रव्यूह
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विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव इस चुनाव को 'करो या मरो' की तरह लड़ रहे हैं। उन्होंने दो ऐसे मुद्दे पकड़े हैं जो सीधे तौर पर युवाओं और पिछड़े-दलित समुदाय को प्रभावित करते हैं।
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    सबसे बड़ा हथियार - रोजगार: तेजस्वी का पहला और सबसे बड़ा वादा रोजगार है। वह अपने 17 महीने के उपमुख्यमंत्री कार्यकाल का हवाला देते हुए कहते हैं, "जो काम 17 साल में नहीं हुआ, वो हमने 17 महीने में किया।" उनका दावा है कि अगर उनकी सरकार बनी तो बिहार में कोई बेरोजगार नहीं होगा।
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    दूसरा ब्रह्मास्त्र - जातिगत जनगणना: तेजस्वी यादव जातिगत जनगणना की रिपोर्ट को लेकर NDA सरकार पर हमलावर हैं। उनका आरोप है कि भाजपा और नीतीश कुमार आरक्षण विरोधी हैं। 65% आरक्षण को 9वीं अनुसूची में शामिल न करने को वे एक बड़ा मुद्दा बना रहे हैं, ताकि RJD के परंपरागत M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण के साथ-साथ EBC और दलित वोटों को भी साधा जा सके।
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असली मुद्दे: जनता क्या चाहती है?
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नेताओं के वादों से इतर, बिहार की जनता के लिए असली मुद्दे क्या हैं? हालिया सर्वे और जमीनी हकीकत बताती है कि बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार सबसे बड़ी चिंताएं हैं।
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    रोजगार: यह मुद्दा तेजस्वी के पक्ष में जाता दिख रहा है। बिहार में पलायन एक बड़ी समस्या है और युवा सरकारी नौकरी को सबसे बड़ी प्राथमिकता मानते हैं।
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    कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार: इन मुद्दों पर NDA, RJD के पुराने शासनकाल ('जंगलराज') की याद दिलाकर तेजस्वी को घेरने की कोशिश करेगा।
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    जाति: बिहार की राजनीति में जाति हमेशा एक बड़ा फैक्टर रहा है। तेजस्वी की जातिगत जनगणना की रणनीति इस फैक्टर को और हवा दे सकती है, जबकि NDA 'सबका साथ, सबका विकास' के नारे के साथ इसे काटने की कोशिश करेगा।
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निष्कर्ष: बिहार का चुनाव 2025 इस बात पर तय होगा कि क्या जनता नीतीश कुमार के विकास के वादों पर एक बार फिर भरोसा करेगी, या तेजस्वी यादव के रोजगार और सामाजिक न्याय के आक्रामक अभियान से प्रभावित होगी। यह चुनाव अनुभव बनाम युवा जोश, विकास मॉडल बनाम नौकरी का वादा, और सुशासन बनाम सामाजिक न्याय की लड़ाई का एक दिलचस्प मुकाबला होने वाला है।
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