नई दिल्ली: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) आने वाले दशकों में अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में अपना दबदबा और अधिक मजबूत करने जा रहा है। भारत अब केवल उपग्रह लॉन्च करने या अपनी घरेलू जरूरतें पूरी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि 2047 तक 'विकसित भारत' के लक्ष्य के साथ दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों को टक्कर देने की तैयारी में है।
यह महत्वपूर्ण बातें इसरो प्रमुख डॉ. वी नारायणन ने आईआईटी दिल्ली (IIT Delhi) में 'इंडियाज स्पेस प्रोग्रामः द चैलेंजेज एंड वे फॉरवर्ड' (India's Space Program: The Challenges and Way Forward) विषय पर आयोजित एक विशेष व्याख्यान के दौरान कहीं। उन्होंने छात्रों और शिक्षाविदों के सामने भारत की अंतरिक्ष यात्रा और भविष्य के महत्वाकांक्षी मिशनों का पूरा खाका पेश किया।
गगनयान और 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' (BAS) पर बड़ा अपडेट
इसरो प्रमुख डॉ. वी नारायणन ने स्पष्ट किया कि भारत के पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन 'गगनयान' (Gaganyaan) की तैयारियां जोरों पर हैं और बहुत जल्द इसका पहला 'मानवरहित मिशन' (Unmanned Mission) लॉन्च किया जाएगा। यह मिशन अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित भेजने और वापस लाने की तकनीक को परखने के लिए एक अहम कदम होगा।
इसके साथ ही, उन्होंने 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' (Bharatiya Antariksh Station) को लेकर भी एक बड़ा ऐलान किया।
Follow the Khabreelal News channel on WhatsApp Join ›2028 का लक्ष्य: भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का पहला मॉड्यूल (First Module) वर्ष 2028 तक अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर दिया जाएगा।
2035 का लक्ष्य: वर्ष 2035 तक इस अंतरिक्ष स्टेशन के सभी अन्य मॉड्यूल तैयार कर इसे पूरी तरह से चालू (Operational) कर दिया जाएगा।
चंद्रयान-4, शुक्र मिशन और 2040 तक चांद पर मानव
इसरो की भविष्य की योजनाओं में केवल पृथ्वी की कक्षा तक सीमित रहना शामिल नहीं है। डॉ. नारायणन ने बताया कि 'चंद्रयान-4' (Chandrayaan-4) मिशन पर भी तेजी से काम चल रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य चंद्रमा की सतह से मिट्टी और चट्टानों के नमूने (Lunar Samples) सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाना है।
इसके अलावा, सौर मंडल के रहस्यों को सुलझाने के लिए 'शुक्र मिशन' (Venus Mission) और वर्ष 2040 तक चंद्रमा की सतह पर 'पहले भारतीय को उतारने' के ऐतिहासिक लक्ष्य की दिशा में भी इसरो लगातार तकनीकी विकास कर रहा है।
अगली पीढ़ी के रॉकेट (NGLV) और दोबारा उपयोग होने वाले यान
इन भारी-भरकम और जटिल मिशनों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए शक्तिशाली रॉकेटों की आवश्यकता होती है। इसरो चीफ ने जानकारी दी कि वर्तमान में 30 हजार किलोग्राम (30 टन) तक के भारी पेलोड को लो-अर्थ ऑर्बिट (Low-Earth Orbit) में पहुंचाने वाले 'नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल' (NGLV) पर काम किया जा रहा है। इसके साथ ही, अंतरिक्ष अभियानों की लागत को कम करने के लिए आंशिक रूप से 'दोबारा उपयोग होने वाले रॉकेट' (Reusable Launch Vehicles) भी विकसित किए जा रहे हैं।
IIT दिल्ली के साथ सहयोग और छात्रों को संदेश
व्याख्यान के दौरान इसरो और आईआईटी दिल्ली के बीच सौर पैनल तकनीक (Solar Panel Technology) और बायोमैकेनिक्स (Biomechanics) समेत अंतरिक्ष से जुड़े नए क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने पर भी सार्थक चर्चा हुई।
आईआईटी दिल्ली के निदेशक प्रो. रंगन बनर्जी ने कहा कि "अंतरिक्ष उन चुनिंदा क्षेत्रों में से एक है, जहां भारत ने पूरी तरह से वैश्विक स्तर की स्वदेशी तकनीक (Indigenous Technology) विकसित की है।" कार्यक्रम के अंत में इसरो प्रमुख डॉ. वी नारायणन ने छात्रों को प्रेरित करते हुए कहा कि, "आपका लक्ष्य सिर्फ एक अच्छी नौकरी हासिल करना नहीं होना चाहिए, बल्कि आपका असली लक्ष्य 2047 तक एक विकसित और सशक्त भारत के निर्माण में अपना अमूल्य योगदान देना होना चाहिए।"
Sabse pehle comment karne wale banein.