उत्तर प्रदेश के बिजनौर स्थित नुमाइश ग्राउंड में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के प्रमुख स्तंभ रहे श्रद्धेय अशोक सिंघल जी के जन्म शताब्दी वर्ष का भव्य शुभारंभ किया गया। इस विशेष Ashok Singhal Birth Centenary समारोह में संत समाज, विहिप पदाधिकारी, कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में स्थानीय गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

शारदा पीठाधीश्वर ने की कार्यक्रम की अध्यक्षता इस भव्य समारोह की अध्यक्षता शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजेश्वराश्रम जी महाराज द्वारा की गई। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष सतीश महाना ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की, जबकि विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय मुख्य वक्ता के तौर पर मौजूद रहे।

राम मंदिर करोड़ों लोगों के सहयोग का परिणाम: सतीश महाना कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि सतीश महाना ने राम मंदिर निर्माण और अशोक सिंघल जी के प्रभाव पर अपने विचार रखे। उन्होंने स्पष्ट किया कि अयोध्या का राम मंदिर किसी एक व्यक्ति के निजी संसाधनों से नहीं बना है, बल्कि यह करोड़ों लोगों के सहयोग और समर्पण का परिणाम है।

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इस दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक सफर के संस्मरण भी साझा किए। महाना ने बताया कि वह लगातार आठ बार से विधायक चुने जा रहे हैं, लेकिन उन्हें जीवन का पहला राजनीतिक टिकट अशोक सिंघल जी के आशीर्वाद से ही प्राप्त हुआ था। इसके अलावा, हाल ही में राम मंदिर चंदे को लेकर उठे विवादों पर भी महाना ने इशारों-इशारों में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों जो कुछ भी हुआ, उससे उनके मन को गहरी ठेस पहुंची है।

अशोक जी का विचार सिर्फ राम जन्मभूमि तक सीमित नहीं था: चंपत राय समारोह के मुख्य वक्ता चंपत राय ने अशोक सिंघल के विहिप में सफर और उनके वैश्विक प्रभाव को याद किया। उन्होंने बताया कि अशोक सिंघल साल 1982 में विश्व हिंदू परिषद से जुड़े थे। इसके बाद उन्होंने दुनिया के 25 देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीयों को उनके पूर्वजों की धरती और संस्कृति के प्रति जागरूक करने का ऐतिहासिक कार्य किया।

चंपत राय ने कहा कि अशोक जी की सोच केवल राम जन्मभूमि आंदोलन तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि उनकी दृष्टि बहुत व्यापक थी और उन्होंने हमेशा समाज में सद्भावना का संदेश दिया। राम जन्मभूमि के लिए उन्होंने देश भर के तीन लाख गांवों का भ्रमण कर लोगों को एकजुट किया। इसके साथ ही, अशोक सिंघल ने हमेशा संत समाज के विचारों और मत को सर्वोपरि रखा।

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