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6 साल में 559 लोगों पर लगी देशद्रोह की धारा, लेकिन सजा महज 10 लोगों को मिली; 73% मामले भाजपा शासित राज्यों में हुए दर्ज

देश में आज की तारीख में कोई सबसे ज्यादा चर्चित शब्द है तो वह है देशद्रोही। सरकार के विरोध में अगर कोई कुछ कह भी देता है तो उसे भाजपा के चाहने वाले देशद्रोही करार दे देते हैं। सोशल मीडिया पर भाजपा सरकार के विरोध में पोस्ट की गईं ज्यादातर पोस्ट के कमेंट सेक्शन में ऐसा देखा जा सकता है।

यहां हम देशद्रोह की बात इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन पर बैठे किसानों को भी देशद्रोही कहा जा रहा है। इन्हीं किसानों के सपोर्ट में बोलने पर सरकार ने कुछ लोगों को गिरफ्तर भी किया है, इन पर सरकार ने IPC की धारा 124A लगाई है। यह वही धारा है जो देशद्रोह करने पर लगाई जाती है। ग्रेटा थनबर्ग ने ट्विटर पर जो टूलकिट शेयर की थी, उस मामले में दिल्ली पुलिस ने बेंगलुरु की एक्टिविस्ट 21 साल की दिशा रवि पर देशद्रोह की धारा लगाई है।

भाजपा राज में ज्यादा बढ़ा चलन

जब से भाजपा सरकार केंद्र में आई है तब से देशद्रोह शब्द ज्यादा चलन में आया है। यह हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि आंकड़े भी इस बात को बता रहे हैं। सरकार ने 2014 से 2019 तक 559 लोगों को 124A के तहत गिरफ्तार किया है, लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि इनमें से महज 10 लोगों पर ही दोष सिद्ध हो पाया है, जबकि बाकी बेकसूर साबित हुए। वहीं इस कानून के तहत सबसे ज्यादा केस भी भाजपा शासित राज्यों में दर्ज होते हैं। यह आंकड़े नेशनल क्राइम रिकॉड ब्यूरो यानि NCRB के हैं। इस कानून के इस्तेमाल पर हर बार सवाल उठते हैं। आरोप लगते हैं कि सरकार लोगों की आवाज दबाने के लिए इनका प्रयोग कर रही है।

124A के सबसे ज्यादा मामले भाजपा शासित राज्यों में
NCRB के सिर्फ 2019 के आंकड़े बातते हैं कि धारा 124A के तहत सबसे ज्यादा मामले उन राज्यों में दर्ज होते हैं, जहां भाजपा या उसके सहयोगियों की सरकार है। 2019 में 124A के तहत 96 मामले दर्ज किए गए थे। इनमें से 68 यानी 73% मामले उन 5 राज्यों में दर्ज किए गए थे, जो भाजपा शासित हैं। सबसे ज्यादा 22 मामले कर्नाटक में दर्ज हुए थे, जहां भाजपा की सरकार है। उत्तर प्रदेश में 10 मामले दर्ज किए गए थे।

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क्यों दोषी साबित नहीं कर पाती सरकार

2. सरकार जल्दबाजी में देशद्रोह की धारा लगा देती है
दरअसल जब भी सरकार के किसी फैसले पर अंगुली उठती है या लोग सरकार का विरोध करने लगते हैं तो सरकार को सत्ता खोने और छवि खराब होने का डर सताने लगता है। ऐसे में सत्ता और छवि बनाए रखने के लिए विरोधी की आवाज को दबाना जरूरी होता है। बस इसीलिए सरकार देशद्रोह के कानून का गलत इस्तेमाल करती हैं और जल्दबाजी में देशद्रोह की धारा लगा दी जाती है। जबकि देशद्रोह के मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि जब तक किसी बात से या कमेंट से कानून व्यवस्था नहीं बिगड़ती है, तब तक उसे देशद्रोह नहीं माना जा सकता।

देश में TADA और POTA जैसे कानून थे, इनका कन्विक्शन रेट बहुत कम था। बाद में इन कानूनों को निरस्त कर दिया गया। अब UAPA भी लाया गया है, इसका कन्विक्शन रेट भी बहुत कम है। कुल मिलाकर सरकार अपनी कमियां छिपाने के लिए लोगों पर देशद्रोह की धारा जल्दबाजी में लगा देती है, लेकिन बाद में इसे साबित नहीं कर पाती।

1. सबूत जुटा पाना बहुत मुश्किल होता है
देशद्रोह के मामलों में दोष साबित करने के लिए सबूत होना जरूरी है। आम तौर पर ऐसे मामलों में पुलिस और अन्य एजेंसियों के पास सीधे सबूत नहीं होते हैं। ऐसा नहीं है कि डायरेक्ट एविडेंस ही सबकुछ है। पर जब तक साजिश साबित न हो किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। वहीं इस तरह के ज्यादातर मामलों में साजिश विदेशी धरती पर रची जाती है, जिससे सबूत जुटाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

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क्यों लगाई जाती है 124A

अगर कोई भी व्यक्ति सरकार के खिलाफ कुछ लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी बातों का समर्थन करता है तो इसे देशद्रोह का अपराध कहा जाता है। किसी देश में सबसे बड़ा अपराध देशद्रोह का होता है। ऐसे व्यक्ति पर IPC की धारा-124A के तहत कार्रवाई की जाती है। देशद्रोह के आरोपी को तीन साल से लेकर उम्र कैद की सजा दी जाती है।

हमारे देश में आए दिन सरकार के फैसलों पर सवाल उठते रहे हैं, हालांकि सरकार के फैसलों पर सवाल उठाना कोई अपराध नहीं है, लेकिन कई बार सवाल उठाने वाले अपनी हदें पार कर जाते हैं जिससे देश की कानून व्यवस्था प्रभावित होती है, तब सरकार को कार्रवाई करनी पड़ती है। 2019-20 में सरकार के लए नागरिक सुरक्षा कानून, हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों के विरोध में भी देश में आवाज उठ रही है, इन दोनों ही मुद्दो को लेकर हिंसा भी हो चुकी है। ऐसे में हिंसा भड़काने के आरोपियों पर देशद्रोह के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

क्या है देशद्रोह

आईपीसी की धारा 124ए कहती है कि अगर कोई भी व्यक्ति भारत की सरकार के विरोध में सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी गतिविधि को अंजाम देता है, जिससे देश के सामने सुरक्षा का संकट पैदा हो सकता है तो उसे उम्रकैद तक की सजा दी जा सकती है। इन गतिविधियों का समर्थन करने या प्रचार-प्रसार करने पर भी किसी को देशद्रोह का आरोपी मान लिया जाएगा। इन गतिविधियों में लेख लिखना, पोस्टर बनाना और कार्टून बनाना जैसे वे रचनात्मक काम शामिल हैं जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बुनियादी आधार हैं।

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लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इन गतिविधियों से पैदा होने वाले खतरे को कैसे मापा जाएगा, इसको लेकर धारा 124ए साफ तौर पर कुछ भी नहीं बताती। इसकी परिभाषा के इस कदर अस्पष्ट होने के कारण यह धारा संविधान की उस भावना के खिलाफ भी खड़ी नजर आती है, जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को अपनी असहमति जताने का हक हासिल है।

कहां से आया देशद्रोह का कानून

17वीं सदी में इंग्लैंड में सरकार और वहां के साम्राज्य के खिलाफ जनता आवाज उठाने लगी थी। सरकार को भी अहसास होने लगा था कि अगर यह आवाजें दबाई नहीं गईं तो उनकी मुश्किलें बढ़ जाएंगी और वे सत्ता से बेदखल हो जाएंगे। ऐसे में लोगों की आवाज को दबाने के लिए पहली बार ब्रिटिश इस सिडिशन कानून या देशद्रोह को लेकर आए थे। यह एक तरह से तानाशाही का प्रतीक है।

भारत में 1860 में इंडियन पीनल कोड यानि IPC लागू हुआ। हालांकि उस वक्त इसमें सिडिशन कानून या देशद्रोह का जिक्रम नहीं था, लेकिन जब अंग्रेजों को लगने लगा कि देश में उनके विरोध में आवाज ज्यादा बुलंद हो रही है तो 1870 में अंग्रेजों ने आईपीसी में संशोधन करके धारा 124A जोड़ी। महात्मा गांधी से लेकर भगत सिंह और न जाने कितने स्वतंत्रत्रता सेनानियों को अंग्रेजों ने यह धारा लगाकर गिरफ्तार किया।

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ब्रिटेन में खत्म हो गया देशद्रोह का कानून

जिस कानून को ब्रिटेन में बनाया गया था आज वह उसी देश ने खत्म कर दिया है। ब्रिटेन ने 2009 में इस अपराध को क्रिमिनल ऑफेंस मानने से इनकार कर दिया था। इसे पुराने जमाने का प्रतीक माना गया जहां अभिव्यक्ति की आजादी उस तरह का अधिकार नहीं था, जैसा कि आज है। इसीलिए 2009 में ब्रिटेन ने कोरोनर्स ऐंड जस्टिस ऐक्ट 2009 लाकर देशद्रोह का कानून खत्म कर दिया था।

इस कानून को खत्म करते वक्त वहां की संसद ने कहा था कि अभिव्यक्ति की आजादी आज लोकतंत्र की पहली जरूरत मानी जाती है।लोगों को सरकार की आलोचना का अधिकार हो, यह आजादी को बरकरार रखने के लिए बेहद जरूरी है। यही नहीं ब्रिटेन के लॉ कमिशन ने साल 1977 में ही देशद्रोह कानून को खत्म कर देने की सिफारिश की थी।

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