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Maharashtra : 150 रोटी लेकर घर जाने की आस में निकले थे 20 मजदूर, आराम करने के लिए ट्रैक पर सो गए… फिर मालगाड़ी से कटकर 16 की मौत

महाराष्ट्र (maharashtra) से मध्यप्रदेश (MP) जा रहे 16 प्रवासी मजदूरों की औरंगाबाद (aurangabad) के पास रेलवे ट्रैक पर मालगाड़ी की चपेट में आने से मौत हो गई। हादसा औरंगाबाद (aurangabad) में करमाड स्टेशन के पास हुआ। मजदूर थके होने की वजह से रेलवे ट्रैक पर ही सो रहे थे। 5 घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। मध्य प्रदेश (MP) और महाराष्ट्र (maharashtra) सरकार ने मृतकों के परिजन को 5-5 लाख रु. की सहायता देने का ऐलान किया है।

maharashtra से मध्यप्रदेश की ट्रेन पकड़ने की आस में निकले थे मजदूर

जानकारी मिली है कि सभी मजदूर जालना की एसआरजे स्टील फैक्ट्री में काम करते थे। गुरुवार को औरंगाबाद से मध्य प्रदेश के कुछ जिलों के लिए ट्रेन गई थी। जिसके बाद घर जाने की आस में ही 20 मजदूर भी जालना से औरंगाबाद के लिए रवाना हुए थे। 40 किमी चलने के बाद वे सभी करमाड के करीब थककर पटरी पर ही सो गए। ‘‘हादसे में 14 मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई। बाद में 2 और ने दम तोड़ दिया। एक की हालत गंभीर है। बचे 4 अन्य लोगों से बातचीत की जा रही है।’’ मजदूर मध्य प्रदेश के शहडोल और उमरिया के बताए जा रहे हैं।

maharashtra

सफर का सहारा : 150 रोटियां और एक टिफिन चटनी 

ज्यादाततर यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश के थे। जिस फैक्टरी में ये मजदूर काम करते थे वह लॉकडाउन के कारण बंद हो गई थी। रोज कमाने-खाने वाले मजदूरों को दो वक्त की रोटी के लाले पड़ गए। जितनी जमापूंजी थी कुछ दिन उससे काम चलाया, जब वो खत्म हो गई तो फिर सामाजिक संगठनों और सरकार के भरोसे रह रहे थे। कुछ मिल जाता था तो खा लेते थे। कभी कभी तो तीन दिन तक भी पेट भर खाना नहीं मिल पाता था। फिर एक दिन पता लगा कि सरकार ने मजदूरों को घर भिजवाने का निर्णय लिया है तो इन मजदूरों को भी घर जाने की आस जागी। खुशी-खुशी सामाजिक संगठनों से मिले राशन से ही इन मजदूरों ने गुरुवार शाम मिलकर 150 रोटियां बनाईं। एक टिफिन में चटनी भी थी। अपना झोला लेकर सब भुसावल के लिए निकल पड़े। सभी की उम्र 21 से 45 साल के बीच थी। कुछ शहडोल जिले के थे तो कुछ कटनी के। औरंगाबाद जिले के करमाड तक पहुंचे तो रात गहरी हो चली थी। सोचा, खाना खाकर कुछ आराम कर लिया जाए। 

नींद खुली तो भयानक मंजर था

सज्जन सिंह इसी जत्थे में शामिल थे। वो बच गए। कहते हैं, “भूख लगी थी साहब। ट्रैक पर ही बैठकर खाना खाने लगे। हमें वो साफ और सुरक्षित लगा। खाना खत्म हुआ। कुछ चाहते थे कि सफर फिर शुरू किया जाए। कुछ का दिल कर रहा था कि थोड़ा सुस्ता लिया जाए। सहमित आराम करने की बनी। भूखे पेट को रोटी मिली थी। इसलिए, पटरी का सिरहाना और गिट्टियां भी नहीं अखरीं। सो गए। नींद खुली तो भयानक मंजर था। मेरे करीब इंटरलाल सो रहा था। उसने मुझे खींच लिया। मैं जिंदा हूं।” 

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